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    बुधवार, 26 अप्रैल 2017

    जौनपुर का इतिहास शाही घरानों और ज़मींदार घरानों से भरा पड़ा है |


    जौनपुर का इतिहास शाही घरानों और ज़मींदार घरानों से भरा पड़ा है | बहुत से घराने ऐसे हैं जो देश के दुसरे हिस्सों में या विदेश में जा के बस गए लेकिन बहुत से ऐसे घराने से जुड़े लोग आज भी जौनपुर में रहते हैं | ऐसा ही एक घराना है खान बहादुर दीवान काशी नरेश अली जामिन का  | सय्यद अली जामिन का जन्म सन १८८४ में हुआ जो जौनपुर कजगांव के रहने वाले थे |उन्होंने अपना करियर डिप्टी कलेक्टर ही हैसीयत से शुरू किया और सन १९३९ में काशी नरेश राजा आदित्य नारायण सिंह ने अली जामिन को दीवान काशी नरेश बना दिया | अपने अंतिम समय में राजा आदित्य नारायण सिंह ने दीवान अली जामिन साहब को बुलाया और अपने १२ साल के पुत्र विभूति नारायण का हाथ उनके हाथ में दे दिया | जुलाई १९47 में विभूति नारायण के हाथ में काशी की सत्ता दे दी गयी | १९४८ में खान बहादुर दीवान काशी नरेश अली जामिन को रामनगर में अपने भाषण के दौरान दिल का दौरा पड़ा उसके बाद अपनी खराब सेहत के कारण उन्होंने त्यागपत्र दे दिया| उनका देहांत सन १९५५ में हुआ | 16 सितम्बर १९४८ को दीवान काशी नरेश अली जामिन के त्यागपत्र देने के बाद हादी अखबार ने लिखा बनारस राज्य एक हिन्दू राज्य होने के बाद भी अधिकतर वहाँ के दीवान जौनपुर के सय्यिद हुआ करते थे जिनके बनारस स्टेट में बहुत अधिक अधिकार प्राप्त थे और स्येद अली जामिन उनमे से अंतिम दीवान थे | 1788 से 1948 तक इस एक सय्येद परिवार के लोग बनारस स्टेट में उच्च पदो पे और दीवान रहे हैं |



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