Tuesday, October 21, 2014

ज्योर्तिमय है हर दिशा, ज्योर्तिमय आकाश - जौनपुर वासियों को दीपावली की शुभकामनाएं -एस एम् मासूम

दीवाली का पर्व हम सबको आत्मचिन्तन एवं आत्मनिरीक्षण का सन्देश देता है। यह पर्व अन्धकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक भी है। 


आप सभी को दीपावली के पवन पर्व पे हमारा जौनपुर और जौनपुर सिटी डॉट इन की टीम की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं दीपों के इस उल्लासमय त्योहार पर हम आप सब के लिए सुख, शांति, समृद्धि की शुभेच्छा मन में रखते हुए ईश्वर से विनती करते हैं कि इस विश्व में आज जो बुराइयां और और नकारात्मक उर्जा व्याप्त है उसका अंत हो और मानव जो पशुत्व के समीप पहुँचता जा रहा है उसे खुद को पहचान के रोकने का प्रयत्न करे और एक सभ्य समाज की स्थापना फिर से की जाए | हमारे अन्दर व्याप्त ..अज्ञान, अविद्या, पाखण्ड, विषय-वासना, असन्तोष, ईर्ष्या, द्वेष आदि अँधेरे का विनाश हो |-- एस एम् मासूम

सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

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Admin
S.MMasum

धनतेरस पे जौनपुर के नज़ारे |

 उत्तरी भारत में कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस का पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास से मनाया जाता है| इस दिन भगवान धनवंतरी का जन्म हुआ था। इसलिए इसे धनतेरस के त्योहार के रुप में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं में धन्वन्तरि के जन्म का वर्णन करते हुए बताया गया है कि देवता और असुरों के समुद्र मंथन से धन्वन्तरि का जन्म हुआ था। वह अपने हाथों में अमृत-कलश लिए प्रकट हुए थे। इस कारण उनका नाम ‘पीयूषपाणि धन्वन्तरि’ विख्यात हुआ। उन्हें विष्णु का अवतार भी माना जाता है। धनवंतरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए इस दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है।
 
धनतेस का पर्व काफी धूमधाम से पूरे जौनपुर जिले में मनाया गया ।बर्तनों की कीमत पिछले साल के मुकाबले २०% बढ़ जाने के बावजूद खरीददारी करने वालों की कमी नहीं दिखाई दी | आज के दिन सोना खरीदना भी शुभ माना जाता है जिसके कारण सोने चांदी के शो रूम ग्राहकोसे भरा रहा और करोडो रुपये की खरीददारी हुयी |
इस खरीद में हर धर्म के लोग शामिल दिखाई  दिए | सडको पे ग्राहकों की भीड़ से शहर में जाम लगा रहा


रीति-रिवाजों से जुड़ा धनतेरस आज व्यक्ति की आर्थिक क्षमता का सूचक बन गया है। एक तरफ उच्च और मध्यम वर्ग के लोग धनतेरस के दिन विलासिता से भरपूर वस्तुएं खरीदते हैं तो दूसरी ओर निम्न वर्ग के लोग जरूरत की वस्तुएं खरीद कर धनतेरस का पर्व मनाते हैं।


धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोक कथा है, कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। |ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।

विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की हे यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु के लेख से मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले हे दूत अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।

दीप-चंद्रा सेवा ट्रस्ट ने बांटे गरीबो को कपडे "आओ मिलकर बांटे खुशियां " अभियान


जौनपुर। आकांक्षा समिति का आओ मिलकर बांटे खुशियां अभियान के तहत मंगलवार को सिरकोनी ब्लाक के रामनगर भड़सरा गांव में स्थित प्रथमिक विद्यालय पर दीप-चंद्रा सेवा ट्रस्ट के तत्वाधान में डेढ़ सौ गरीबों को पुराने कपड़े खिलौने और किताबे बाटी गयी। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि आकांक्षा समिति की अध्यक्ष /एसडीएम रितु सुहास रही अध्यक्षता दीप-चन्द्रा सेवा ट्रस्ट के सचिव राजेश श्रीवास्तव ने किया। इस मौके पर रितु सुहास ने सभी उपस्थित जनता को दीपावली की बधाईयां देते हुए बताया कि यह अभियान सभी गरीबो के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने के लिए और सभी खुशनुमा माहौल में दीपावली मनाने के लिए किया गया। यह कपड़े जो आज वितरित किये जा रहे हैं वह जिले की जनता ने दिया है। विशिष्ट अतिथि लायंस क्लब के अध्यक्ष मो0 मुस्ताफा रहे। स्कूल की शिक्षिका इन्दुमति सिंह बंदना सिंह सुमन सिंह ने मुख्य अतिथि को माल्यापर्ण कर स्वागत किया। कार्यक्रम का संयोजक मो0 अब्बास रहे। राजकुमार सिंह अजीत सिंह विद्यासागर कश्यप विश्व प्रकाश श्रीवास्तव ने इस कार्यक्रम को सम्पन्न कराने में विशेष सहयोग प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार रामजी जयसवाल ने किया। इस मौके पर मुख्य रूप नीरज सिंह आलोक सिंह डिग्गू शर्मा कमलेश त्रिपाठी विक्की सिंह विवेक वर्मा मनोज पटेल ने अपना सराहनीय योगदान किया। 

‘तमसो मा ज्योतिर्गमय है दीपावली का सन्देश |

DSC05306 भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय , तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन,सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा का सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।
दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी मे आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए।
DSC05315दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दशहरे के पश्चात ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग नए-नए वस्त्र सिलवाते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। इस दिन बाज़ारों में चारों तरफ़ जनसमूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बरतन खरीदना शुभ माना जाता है अतैव प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार कुछ न कुछ खरीदारी करता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाज़ारों में खील-बताशे , मिठाइयाँ ,खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं । स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दूकानें सजी होती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ व उपहार बाँटने लगते हैं। दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं।

DSC05311d चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार व गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ, आतिशबाज़ियाँ व अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है। दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बनाया था। इसी दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। वे दूकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ़ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं।
जौनपुर में इस वर्ष प्रशासन ने राज कालेज तथा बीआरपी के मैदान पर पटाखों की दुकान लगाने का लाइसेंस ज़ारी किया है बाकी शहर में इस्पे रोक लगा दी गयी है |प्रशासन द्वारा इस बात पर एहतियात बरता जा रहा है कि पटाखों से किसी भी तरह की क्षति न होने पाए। इसलिए घनी आबादी वाले इलाकों में इसकी दुकान लगाने को प्रतिबंधित कर दिया गया है। सरकारी अस्पतालों में जहां आकस्मिक चिकित्सा के उपाय किए गए हैं वहीं अग्निशमन विभाग की गाड़ियां भी कहीं से भी आग लगने की सूचना पर पहुंचने के लिए तैयार रहेंगी।
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Monday, October 20, 2014

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने प्रदूषण मुक्त दीपावली मनाने की अपील की।

जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के विद्यार्थियों ने पर्यावरण एवं लोक परम्परा को जीवित रखने के उद्देश्य से सोमवार को विश्वविद्यालय परिसर में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को माटी के दीये वितरित कर प्रदूषण मुक्त दीपावली मनाने की अपील की।




Sunday, October 19, 2014

लोक संस्कृति पर उपभोक्तावादी संस्कृति के मंडराते खतरे –श्रद्धा

लोक संस्कृति पर उपभोक्तावादी संस्कृति के मंडराते खतरे –श्रद्धा

लोक संस्कृति सभी संस्कृतियों का उत्स है। वस्तुतः लोक संस्कृति में सामाजिक समरसता और जियो और जीने दो का भाव था जबकि आज के समाज पर हावी उपभोक्तावादी संस्कृति में विनाष और केवल अपने लिए सब कुछ समेट लेने का भाव है। लोक संस्कृति जॅंहा प्रकृति के साथ जुड़ाव की संस्कृति थी वहीं उपभोक्तावादी संस्कृति केवल प्रकृति का दोहन करना जानती है। आज जो इतनी सारी विपदाएं हमारे सामने विकराल रूप धारण किये है उसके पीछे भी कहीं न कहीं यह उपभोक्तावादी संस्कृति है जो सिर्फ लेना ही लेना जानती है।
उपभोक्तावादी संस्कृति की वजह से आज हमारे  मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है। कमोबेष षहर तो इसके षिकार थे ही किन्तु यह स्थिति गाॅंवों को और भी तेजी के साथ अपनी चपेट में ले रही है। संयुक्त परिवार का विघटन, आपसी क्लेष, द्वेश और ईश्या के चलते ग्रामीणों में भी भाईचारे की भावना खत्म होती जा रही है। नये राजनैतिक हस्तक्षेपों से समाज ज्यादा वर्गाें और धड़ो में बॅंट गया है। राजनैतिक समीकरणों को बैठाने के चक्कर में बाहरी षक्तियां कई बार जानबूझकर इनके बीच द्वेश फैलाती है। बदली हुई राजनैतिक परिस्थतियों में आज वह वर्ग धीरे धीरे हावी होने लगे है, जिन्हें एक समय तक बहुत दबा कर रखा जाता था। षिवमूर्ति का तर्पण, सगीर रहमानी का अषेश, और रामधारी सिंह दिवाकर का उपन्यास अकाल सन्ध्या इस स्थिति को बड़ी बारीकी से स्पश्ट करता है।
उपभोक्तावादी प्रवृत्ति षहरों में बढ़ी है और ग्रामीण निरंतर षहरों की ओर खिंच रहे हैं, निरंतर छोटी हो रही जोतों ओर दिन भर हाड़ तोड़ने के बाद भी अपनी आवष्यक जरूरतों को पूरा न कर पाने वाला ग्रामीण षहरों में मजदूर बनने को विवष है। गाॅंव की खुली हवा में साॅंस लेने वाले लोग षहर की बन्द कोठरियों, सीलन और बदबूदार झोपडि़यों में रहने को मजबूर है।


उपभोक्तावादी संस्कृति पष्चिम की देन है और उपनिवेषवाद के दौर से ही इसकी षुरूआत मानी जा सकती है। औद्योगिक क्रान्ति के साथ साथ उपभोक्तावादी संस्कृति का जन्म आवष्यक हो गया था। उद्योग लगाने के साथ ही मुनाफा कमाने की जद्दोजहद षुरू हो जाती है। विज्ञापन की विधिवत षुरूआत भी औद्योगिक क्रान्ति के बाद ही हुई। विज्ञापन भी उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ाने वाला ही एक माध्यम है। विज्ञापन के द्वारा लोगो में लालच पैदा किया जाता है , सपने बेचे जाते है। आज गोरा बनाने वाली क्रीमों के जितनें विज्ञापन आते है उनकी वास्तविकता यह है कि वह एक तरह का भ्रम बेच रहे हैं जो लोगों में इस गलत धारणा का निर्माण करती है कि गोरा होना मात्र ही सुंदरता का पर्याय है। इसी तरह सौंदर्य उत्पादों के नाम पर जितनी भी चीजें बेची जा रहीं हैं वह थोड़े समय के लिए कारगर लग सकतीं है पर लंबे समय तक इनका इस्तेमाल आपको घातक रोगों का षिकार बना सकता है। एक बार इन अप्राकृतिक रसायनों का इस्तेमाल करने के बाद जब आप समस्या के निवारण के लिए डाक्टर के पास जाते है तो महगीं दवाईयों का क्रम षुरू हो जाता है और जैसे ही आप इन दवाईयों का इस्तेमाल बंद करते हैं आपकी दषा पहले से भी खराब हो जाती है। यह एक ऐसा चक्र है जिससे आप छुटकारा नहीं पा सकते। बाजारू चकाचैध से प्रभावित होकर आपने एक बार जिस उत्पाद का प्रयोग किया वह आपको जीवन भर अपने उपर निर्भर बना देता है। उपभोक्तावाद लोगों की इसी प्रवृत्ति का फायदा उठाता है।


इस समय बाजार मंे उपलब्ध ‘रेडी टू ईट फूड’ का प्रचलन बढ़ रहा है, पष्चिम की तर्ज पर और सुगम होने के कारण कामकाजी महिलाओं में इसके लोकप्रिय होने की पूरी सम्भावनाएं हैं। लेकिन मा के हाथ के खाने से बच्चों का जो भावनात्मक रिष्ता होता है उसमें इस ‘रेडी टू ईट’ वाली संस्कृति से कहीं न कहीं विचलन जरूर आएगी।
थोड़े में भी खुष रहने वाली जिस लोक संस्कृति को, ज्यादा को भी कम समझने वाली जिस उपभोक्तावादी संस्कृति ने कवस्थापित किया है उसमें लोग भूख मिटाने के लिए नहीे स्वाद बदलने के लिए खाते हैे और तन ढ़कने के लिए नहीं फैषन के लिए कपड़े पहनते हैं। एक वक्त था जब लोग सोचते थे एकमुष्त पैसे क्यों न लग जाय पर चीज टिकाउ होनी चाहिये। पर आज नित नया फैषन आ रहा है और लोग भी रोज कुछ नया चाहते है। इसलिए कुछ तो लोग जानबूझकर ऐसी चीजें खरीदते है जो थोड़े वक्त चलें, और कम्पनियांॅ भी ऐसा माल बनाती है ताकी वह जल्दी खराब हो जाय और लोग बार बार खरीदें। इससे कम्पनियांॅे को आर्थिक लाभ होता है। ‘यूज एण्ड थ्रो’ की यह अवधारणा उपभोक्तावादी संस्कृति  की ही देन है। यह मंत्र आज वस्तुओं के साथ ही नहीं बल्कि लोग आपसी सम्बन्धों के बीच भी इस्तेमाल कर रहें हैं। जिसके कारण एक ऐसे समाज का निर्माण हो रहा है। जिसके कारण एक ऐसे समाज का निर्माण हो रहा है जो दिन ब दिन अविष्वसनीय होता जा रहा है।


इसी वजह से षहरों में आज एकाकीपन बढ़ा है। लोगों की मानसिकता इतनी संकुचित होती जा रही है कि वे अपने आसपास में कश्ट में फंसे व्यक्ति को देखकर कन्नी काट लेते है और सबकुछ जानते बूझते हुए भी अपनी हुए भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त रहते हैं इसीलिए हमाारे समाज में भी ऐसी अनहोनी घटनाएं घटने लगी है जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। अभी हाल में अखबारों के माध्यम से प्रकाष में आई नोएडा की दो बहनों की कहानी इसी की एक छोटी सी नजीर कही जा सकती है।
लोक संस्कृति को पिछड़ी संस्कृति मानकर भले ही हम उससे मुॅंह फेर लें , मगर इस संस्कृति के फायदे हमें वैसे वैसे पता चलते जाएगंे जैसे जैसे उपभोक्तावादी संस्कृति के नुकसान हमारे सामने आएगें। लोक संस्कृति में समाज का आपके निजी जीवन पर भी नियंत्रण बना रहता था। आपको समाज की एक इकाई के रूप में देखा जाता था। समाज यदि आपके सुख का भागीदार था तो आपके दुख में भी हाथ बंटाता था। यद्यपि इसके लिए हमें कई बार उसके कुछ कठोर नियमों का भी पालन करना पड़ता था। कई बार नृषंसता लोक संस्कृति का अनिवार्य अंग लगने लगती है जैसा कि हाल फिलहाल में आए खाप पंचायत के फैसलों में दिखाई देता है। लेकिन फिर भी एसी घटनाएं कभी कभार ही घटती हैं।


उपभोक्तावादी संस्कृति के भी अपने खतरे हैं । उपभोक्तावादी संस्कृति का एक बड़ा दुश्परिणाम यह हुआ कि आर्थिक अव्यवस्था फैल गई, और आर्थिक मंदी के एक बड़े दौर से विष्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को लगातार जूझना पड़ा। जिसके असर से अब भी कई देष उबर नहीं पाये हैं। कह सकतें हैं कि भारतीय लोक संस्कृति के ही एक तत्व जिसमें उधार पर जीवन जीना बुरा माना जाता है के कारण लोगों ने उस तरह से लोन पर भौतिक सुख सुविधाओं का ताष का महल खड़ा करने की कोषिष नहीं की जैसाकि पष्चिमी देषों में हुआ। पष्चिमी देषों में ज्यादातर लोगों ने बैंक से लोन लेकर गाड़ी इत्यादी भौतिक सुख सुविधाओं की चीजें तो खरीद लीं किन्तु बैंकों के पैसे वापस नहीं किये। ज्यादा कर्ज देने की वजह से बैंकों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई और ज्यादातर बैंक सरकारी सहायता मिलने के बावजूद डूबते चले गये। अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती, उपभोक्तावादी संस्कृति ने जिस तेजी के साथ पाॅंव पसारे थे उसी तेजी के साथ उसका खोखलापन भी सामने आ गया।


भूमण्डलीकरण का दौर जिन सुनहरे ख्वाबों को लेकर आया था उनकी सच्चाई आज हमारे सामने आ चुकी है। भूमण्डलीकरण और विष्वबन्धुत्व के नाम पर विकास की बातें की जा रहीं थीं वह पूरी तरह खोखली साबित हो चुकी हैं। अन्यथा अमेरिका जैसे विकसित देष जो उपभोक्तावादी संस्कृति की नुमाइंदगी करते हैं वे आर्थिक मंदी से पूरी तरह चरमरा न गये होते। अमेरिका एक ऐसा देष है जो किसी चीज का बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं करता, ज्यादातर चीजें आयातित करता है फिर भी सबसे धनवान देष है और सारे विष्व पर अपना प्रभुत्व जमाता है। तत्कालीन अमेरिकी राश्ट्र्पति बराक ओबामा आर्थिक मंदी के बाद वहाॅं की अर्थव्यवस्था को सम्हालने में लगे हैं इसलिए रोज आम जनता को नई नई सलाह देते हैं। उन्हें भारतीय डाक्टर जो कम दाम में ज्यादा काम करते हैं तो अपने देष में मंजूर है मगर अमेरिकी नागरिकों का भारत आकर सस्ता ईलाज करवाना मंजूर नहीं।


वे अमेरिकी नागरिकों केा अमेरिका में ही ईलाज करवाने की सलाह देते हैं ताकि उनके देष का पैसा उनके देष में ही रहे। किन्तु भारत के नागरिकों के द्वारा चुकाए गए कर के पैसों पर डाक्टर, इन्जीनियर बने भारतीय से उन्हें कोई गुरेज नहीं। जबकि आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कोसों तक एक अच्छा डाक्टर ढ़ूढ़ने से भी नहीं मिलता। आधे लोग तो डाक्टर के पास पहुॅंच ही नहीं पाते और जो पहुॅंच पाते हैं वे झोला छाप डाक्टरों के षिकार हो जाते हैं। यह हालात गाॅंव के डाक्टरों के नहीं बल्कि भारत की राजधानियों के कुछ अच्छे अस्पतालों के भी हैं। यह कैसा भूमण्डलीकरण है जिसमें एक देष अपनी सहूलियत के अनुसार दूसरे देष का दोहन करने की आजादी पा लेता है। उपभोक्तावादी संस्कृति केवल किसी चीज को पा लेने भर से आपको संतुश्ट नहीं रहने देती बल्कि वह व्यक्ति को इतना लालची बना देती है कि वह बाजार में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु की चाहना करने लगता है। जरूरत से ज्यादा इकट्ठा करने की यह प्रवृत्ति व्यक्ति की विचारषीलता को कुंद कर देती है। गांधी जी ने कहा था कि जब भी कोई काम करने चलो, सबसे पहले अपने देष के सबसे गरीब के बारे में सोचो कि इस काम से उसे क्या लाभ होगा! विकासषील  देषों को हाषिए के व्यक्ति का ध्यान रखते हुए विकास करने की सलाह गांधी जी ने बहुत पहले दी थी किन्तु लोग इस मानवता के मंत्र को भूल चुके हैं। जिनके पास क्रयषक्ति है वे विदेषी खिलौनो जैसे लैपटाप, मोबाईल इत्यादि के नए नए माडलों को खरीदने में लगें हैं जबकि उन्हीं के देष में सैकड़ों लोग भुखमरी के षिकार हैं। गजब की बात है कि हमारे नीति निर्माता भी उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हंै। पिछले दस वर्शों में लोगो की क्रयषक्ति बढ़ी है तो लैपटाप, मोबाईल, गाडि़यांॅ सस्ते हुए हैं किन्तु अनाज, सब्जी और खाद्य पदार्थों के दाम उपर जा रहे है। क्या हमारी न्यूनतम आवष्यकताएं लैपटाप, मोबाईल और गाडि़यांॅ हैं!
 
इलेक्ट्र्ानिक उत्पादों का आयात बढ़ा है जबकि हमारी कृशि उत्पादन क्षमता हमारी जनसंख्या के अनुपात में नहीं बढ़ी। कृशि भूमि पर कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे हैं। वनों का दोहन हो रहा है, भू-संसाधनों जैसे कोयला, पानी सभी का तेजी से क्षय हो रहा है। ऐसा लग रहा है मानो सबकुछ को हड़प लेने की बाॅंट जोह रहे हमारे चंद उद्योगपति पृथ्वी का सारा रस निचोड़ लेना चाहते हैं। बाद की पीढि़यों के लिए क्या रह जाएगा इसकी चिंता किसी को नहीं।


आज हमारे देष में आतंकवाद से भी बड़ी चुनौती नक्सलवाद के रूप में सामने खड़ी नजर आ रही है तो उसके पीछे यही सब कारण है। संजीव के उपन्यासों जैसे जंगल जॅंहा षुरू होता है, धार, सावधान नीचे आग है, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड की पृश्ठभूमि पर इन्हीं समस्याओं को उठाने वाले उपन्यास है।

उपभोक्तावादी संस्कृति का सबसे ज्यादा खामियाजा समाज के सबसे निचले तबके को झेलना पड़ता है। आदिवासी हमारे समाज के सबसे अधिक हाषिए पर हैं। सरकार उनके विकास के लिए कोई ठोस कदम नहीें उठाती इसके विपरीत उनके प्राकृतिक संसाधनों जंगल और पानी पर भी कब्जा करती जा रही है और इन पर कब्जाकर बहुराश्ट््रीय कम्पनीयों को सस्ते दामों पर बेचती जा रही हैं। ये बहुराश्ट््रीय कम्पनियाॅ आदिवासियों को मजदूर बनाकर परोक्ष रूप से इन पर षासन करना चाहती हैं। यह स्वतंत्र भारत के भीतर उपनिवेषवाद के ही एक दूसरे स्वरूप के पनपने जैसा है। अपने ही संसाधनों पर इन आदिवासी लोगों का अधिकार समाप्त कर दिया जाना सरकारी तंत्र द्वारा इनके षोशण का साक्षात प्रमाण है। राकेष कुमार सिंह के उपन्यास पठार पर कोहरा और जहाॅ खिले हैं रक्तपलाष ऐसे ही आदिवासी बहुल इलाकों की बात करते हंै। ऐसे में जब इन आदिवासी जातियों के सामने जीने और खाने के प्रष्न महत्वपूर्ण होते जा रहे हों, उनकी अपनी संस्कृति के समाप्त होने के पूरे आसार बन चुके हों और उन्हें एक अप्राकृतिक स्थिति में जबरदस्ती ढकेला जा रहा हो तो उनका षासन के खिलाफ बन्दूक उठाना स्वाभाविक सा लगने लगता है। मगर बन्दूक से किसी बात का हल नहीं निकल सकता यह तथ्य भी उतना प्रामाणिक है इसलिए आदिवासियों की समस्या को सुना जाना चाहिए और सरकार को उनके हितों का ध्यान रखना चाहिए।

भारत एक लोकतंत्र है जिसमें लोक का महत्व सबसे अधिक होना चाहिए लोक की संस्कृति को कायम रखने से ही हमारी स्वाभाविक प्रगति हो सकती है। किसी थोपी हुई उपभोक्तावादी संस्कृति से केवल विनाष और आपसी विद्वेश ही फैलेगा। आज जरूरत इस बात की है कि अन्धाधुन्ध आधुनिकता की दौर में षामिल होने के लिए अपनी सांस्कृतिक मूल्यों की अनदेखी न की जाय बल्कि उन मूल्यों की रक्षा करते हुए आगे बढ़ने के प्रयास किए जायं।












विजयदशमी के बाद लगता है शाहगंज का ऐतिहासिक चूड़ी मेला |


कल शाहगंज के ऐतिहासिक चूड़ी मेले में महिलाओं की काफी भीड़ उमड़ी जहां उन लोगों द्वारा जमकर खरीददारी की गयी। इस बाबत जहां अच्छे-अच्छे दुकान लगे थे और तरह तरह की मनभावन चूड़ियों की भरमार थी इसीलिये इस वर्ष भरी भीड़ इस मेले में आये ,वहीं उमड़ी भारी भीड़ द्वारा की गयी खरीददारी से दुकानदार भी खुश नजर आये।


स्थानीय नगर के चूड़ी मोहल्ला में लगने वाले इस ऐतिहासिक मेले की मान्यता है कि विजयदशमी के बाद मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद माता सीता़ अयोध्या के श्रृंगार हाट के लिये निकलीं जहां उन्होंने अपनी सहेलियों के साथ खरीददारी कीं। इसी मान्यता के मद्देनजर अयोध्या रूपी शाहगंज में श्री रामलीला समिति व चूड़ी मोहल्लावासियों के सहयोग से यह मेला आयोजित होता है। इसकी एक खास बात यह है कि मेले में पुरूषों का प्रवेश पूरी तरह से प्रतिबंधित है। मेले के मद्देनजर दोनों छोर पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किये गये थे जहां महिला पुलिस की भी ड्यूटी लगायी गयी थी। देखा गया कि मेले में स्थानीय दुकानदारों के अलावा गैरजनपद के लोग दुकान लगाये थे जिन्होंने आकर्षक चूडि़यों को सजाया था। वहीं नगर की तमाम महिलाओं सहित दूर-दराज से आये लोगों ने भी जमकर खरीददारी किया।

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