Thursday, August 21, 2014

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जौनपुर से रिश्ता |


उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का कई साल  मेरा साथ रहा है| जब मैं वाराणसी मैं पढता था तो अक्सर दालमंडी मैं उनके घर आना जाना हुआ करता था | उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को मैंने सबसे पहले अपने वतन जौनपुर में नवी मुहर्रम को मीर घर की अज़ादारी जुलुस में सुना था |

सादगी भरा जीवन और ऐसा नेक इंसान की सारी सुविधाओं ,शोहरत और धन दौलत के होते हुए भी बनारस की सड़कों पे पैदल ही चला करता था | आज उनके बारे कुछ बातें आपके सामने हैं |

उस्ताद बिस्मिल्लाह का जन्म 21 मार्च 1916 को एक बिहारी शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनका नाम उनके अम्मा वलीद ने कमरुद्दीन रखा था, पर जब उनके दादा ने नवजात को देखा तो दुआ में हाथ उठाकर बस यही कहा - बिस्मिल्लाह. शायद उनकी छठी इंद्री ने ये इशारा दे दिया था कि उनके घर एक कोहेनूर जन्मा है| उनके वालिद  पैगम्बर खान उन दिनों भोजपुर के राजदरबार में शहनाई वादक थे|

तीन  साल की उम्र में जब वो बनारस अपने मामा के घर गए तो पहली बार अपने मामा और पहले गुरु अली बक्स विलायतु को वाराणसी के काशी विश्वनाथ मन्दिर में शहनाई वादन करते देख बालक हैरान रह गया| नन्हे भांजे में विलायतु साहब को जैसे उनका सबसे प्रिये शिष्य मिल गया था| १९३० से लेकर १९४० के बीच उन्होंने उस्ताद विलायतु के साथ बहुत से मंचों पर संगत की | १४ साल की उम्र में अलाहाबाद संगीत सम्मलेन में उन्होंने पहली बंदिश बजायी |  उत्तर प्रदेश के बहुत से लोक संगीत परम्पराओं जैसे ठुमरी, चैती, कजरी, सावनी आदि को उन्होने एक नए रूप में श्रोताओं के सामने रखा और उनके फन के चर्चे मशहूर होने लगे| १९३७ में कलकत्ता में हुए अखिल भारतीय संगीत कांफ्रेंस में पहली बार शहनायी गूंजी इतने बड़े स्तर पर, और संगीत प्रेमी कायल हो गए उस्ताद की उस्तादगी पर|

शादी हो या फिर मातमी माहौल क्सर आपको शहनाई की धुन सुनाई पड़ जाती होगी। इस शहनाई की गूंज केवल अपने देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में पहुंचाने का श्रेय शहनाई के जादूगर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को जाता है। उनका का निधन 21 अगस्त 2006 को हुआ था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की आज आठवी बरसी है।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को गंगा से बड़ा लगाव था। वे मानते थे कि उनकी शहनाई के सुरों से जब गंगा की धारा से उठती हवा टकराती थी तो धुन और मनमोहक हो उठती थीं। यही वजह है कि दुनिया भर से उस्ताद को अपने यहां आने और रहने के प्रस्ताव आए, लेकिन उनका बस एक ही जवाब होता था, 'अमा यार ! गंगा से अलग रहने को तो न कहो'। 
आज भी दालमंडी स्थित खान साहब के कमरों में रियाज की पिपहरी, जूता, चप्पल, उनके कागजात को सहेज कर रखा गया है। खां साहब को गंगा और काशी विश्वनाथ से खांसा लगाव था। इसीलिए वो काशी छोड़कर कभी नहीं गए। यह भी अजीब इत्तफाक है कि खां साहब की पैदाइश की तारीख भी 21 है और उनके इंतकाल की भी। 21मार्च को उनका जन्म हुआ था और 21 अगस्त को उनका देहांत। 

 संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1956), पद्मश्री (1961), पद्मभूषण (1968), पद्म विभूषण (1980), तालार मौसीकी, ईरान गणतंत्र (1992), फेलो ऑफ संगीत नाटक अकादमी (1994), भारत रत्न (2001) सहित बहुत से  पुरस्कार बिस्मिल्लाह खान को मिले|उस समय ऐसा लगता था की पुरस्कार देने वाली संस्थाएं बिस्मिल्लाह खान को पुरस्कार दे के आपका क़द ऊंचा कर रही हैं| 

यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे की  जब हिन्दुस्तान आज़ाद हुआ तो देश की फ़िजाओं में 15 अगस्त 1947 को  गंगा के घाट के इस लाल के शहनाई की धून दिल्ली के लाल किले से गुंजने लगी, लोग भाव-विभोर होकर झुमने लगे थे. 26 जनवरी 1950 को जब देश में पहला गणतंत्र दिवस मनाया गया तो उस समय भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अनुरोध पर  गंगा के घाट के इस लाल की शहनाई दिल्ली के लाल किले से गुंज उठी थी|

वर्ष 2006 में उन्हें तबियत खराब होने पर वाराणासी के अस्पताल ले जाया गया जहां उन्होंने 21 अगस्त 2006 को अपनी अंतिम सांस ली। उनके शहनाई के प्रति प्रेम को देखते हुए उनके शव के साथ शहनाई भी दफनाई गई और भारतीय सेना द्वारा 21 तोपों की सलामी दी गई।



Wednesday, August 20, 2014

कितने किलो एटम बम तौल दूँ भाई ?

जौनपुर जिला मुख्यालय से ५० किलोमीटर दूर एक जगह  है सुजानगंज, जहाँ की एक मिठाई बहुत प्रसिद्द है उसका नाम है एटम-बम | जो इस मिठाई के बारे में नही जानता वह बाज़ार में इस मिठाई का नाम सुन कर चौक जाता है, किसी भी मिठाई की दुकान पर जाइये तो वहाँ एटम बम -एटमबम ही सुनायी पड़ता है| एटम बम खायेंगे या कितने किलो  एटम बम दूँ यही आवाजें आती -जाती रहती हैं | इस मिठाई को देखने से यह राज - भोग का भ्रम पैदा करता है लेकिन यह राजभोग से थोड़ा अलग किस्म की मिठाई है और शुद्ध गाय के छेने से बनने वाली इस मिठाई का वजन है लगभग १७० ग्राम प्रति नाग होता है | अच्छे -अच्छे लोग इसे एक बार में नहीं खा सकते |

मैं इसके बारे मैं इसलिए बता रहा हूँ की जब आप भी यहाँ आये तो इसका स्वाद जरुर ले।


जानिये जौनपुर की मशहूर इमरती का इतिहास और साथ में लीजिये इसका स्वाद |

जौनपुर की मशहूर इमारती के बारे में यह जानकारी मैंने दो वर्ष पहले अपनी वेबसाइट जौनपुर सिटी डॉन इन के द्वारा आप सभी से बांटी थी जिसे लोगों ने बहुत पसंद भी किया और बार बार अनुरोध भी किया की इस जानकारी को आगे बढाया जाए | इस जानकारी को बहुत से लोगों ने मेरे द्वारा खींची तस्वीर के साथ औरों तक पहुँचाया भी लेकिन अपने नाम से जो उचित नहीं लेकिन मेरा मकसद नाम कमाना नहीं बल्कि जौनपुर को विश्व से जोड़ना रहा है इसलिए मैं उनका भी आभारी हूँ की उन्होंने इस जानकारी को औरों तक पहुँचाया | 

मैं मुंबई से जब भी जौनपुर आता हूँ तो मेरी कोशिश यह हुआ करती है की मैं जौनपुर के बारे में अधिक से अधिक जानकारी खुद इकठ्ठा करूँ और लोगों तक पहुँचाऊँ | इसी प्रयास में जा पहुंचा बेनीराम की दूकान पे जहां मुझे उनका सहयोग भी मिला और मुफ्त में इमारती भी खाने को मिली | यही हैं जौनपुर की खासियत आने वाले मेहमान की इज्ज़त करते हैं |


एक बार फिर से आप सभी के सामने पेश हैं जौनपुर की इमारती क्यूँ की इसे जितनी बार खाया जाए मज़ा कम नहीं होता |


जौनपुर जो "शिराज़-ए-हिंद" के नाम से भी मशहूर हैं, भारत के उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर एवं लोकसभा क्षेत्र है। मध्यकाल में शर्की शासकों की राजधानी रहा जौनपुर  गोमती नदी के दोनों तरफ़ फैला हुआ है। कभी यह  अपने इत्र और सुगंधित चमेली के तेलों के लिए मशहूर था लेकिन आज वहाँ इत्र तो कभी कभार दिख जाता है लेकिन चमेली का  तेल तलाशना मुश्किल हो जाता है.



लेकिन जौनपुर शहर की हरे उड़द, देशी चीनी और देशी घी से लकड़ी की आंच पर बनी लजीज ‘इमरती’ अब भी देश-विदेश में धूम मचा रही है. शहर के ओलन्दगंज के नक्खास मुहल्ले मैं  बेनीराम कि दूकान वाली इमरती कि बात हे और है. बेनीराम देवी प्रसाद ने सन 1855 से अपनी दुकान पर देशी घी की ‘इमरती’ बनाना शुरू किया था||


उस गुलामी के दौर मैं भी  बेनीराम देवीप्रसाद कि  इमरती सर्वश्रेष्ट मणि जाती थी. उसके बाद बेनी राम देवी प्रसाद के  उनके लड़के बैजनाथ प्रसाद, सीताराम व पुरषोत्तम दास ने  जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती की महक तक बनाए रखी .अब जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती को बेनीराम देवी प्रसाद की चौथी पीढ़ी के वंशजों रवीन्द्रनाथ, गोविन्, धर्मवीर एवं विशाल ने पूरी तरह से संभाल लिया है और इसे विदेश भी भेजा जाने लगा है.  जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती आज तकरीबन 159 वर्ष पुरानी हो चुकी है और उसका स्वाद और गुणवत्ता अभी भी बरकरार है|



जब कभी आप जौनपुर आयें तो ओलन्दगंज से ताज़ी इमारती का स्वाद चखना ना भूले | इमरती के लिए देशी चीनी आज भी बलिया से मंगाई जाती है। देशी चीनी और देशी घी में बनने के कारण इमरती गरम होने और ठंडी रहने पर भी मुलायम रहती है। बिना फ्रिज के इस इमरती को कम से कम दस दिन तक सही हालत में रखा जा सकता है।

Tuesday, August 19, 2014

जौनपुर अपना एक वि‍शि‍ष्‍ट ऐति‍हासि‍क, धार्मिक एवं राजनैति‍क अस्‍ति‍त्‍व रखता है

जौनपुर शहर गोमती नदी के किनारे बसा एक सुंदर शहर है जो अपना एक वि‍शि‍ष्‍ट ऐति‍हासि‍क, धार्मिक  एवं राजनैति‍क अस्‍ति‍त्‍व रखता है| यहाँ पे गोमती नदी की सुन्दरता आज भी देखते ही बनती है और आज भी इसके शांतिमय  तट लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं |कभी यह तट तपस्‍वी, ऋषि‍यों एवं महाऋषि‍यों के चि‍न्‍तन व मनन का एक प्रमुख  स्‍थल हुआ करता था था। इसी कारण से आज भी गोमती किनारे यहाँ बहुत से मंदिर देखे जा सकते हैं जहां जा के शांति का एहसास हुआ करता है | यहीं महर्षि‍ यमदग्‍नि‍ अपने पुत्र परशुराम के साथ रहा करते थे |बौध सभ्यता से ले कर रघुवंशी क्षत्रि‍यों वत्‍सगोत्री, दुर्गवंशी तथा व्‍यास क्षत्रि‍य,भरो एवं सोइरि‍यों का यहाँ राज रहा है | कन्नौज से रजा जयचंद जब यहाँ आया तो गोमती नदी की सुन्दरता से मोहित हो के उसने यहाँ अपना एक महल जाफराबाद जौनपुर में नदी किनारे बनाया जिसके खंडहर आज भी मौजूद हैं | उसके बाद आये यहाँ शार्की जिनके काल में हि‍न्‍दु - मुस्‍लि‍म साम्‍प्रदायि‍क सदभाव का अनूठा दि‍गदर्शन रहा और जो वि‍रासत में आज भी वि‍द्यमान है।


बोद्ध सभ्यता के निशाँ तो अब यहाँ बाक़ी नहीं रहे लेकिन ऐतोहसिक मंदिरों और शार्की काल में बने भव्‍य भवनों, मस्‍जि‍दों व मकबरों के निशाँ आज भी इस शहर के वैभव की कहानी कह रहे हैं |1484 ई0 से 1525 ई0 तक लोदी वंश का जौनपुर की गद्दी पर आधि‍पत्‍य रहा| इब्राहीम लोधी ने जौनपुर शहर की सुन्दरता को ग्रहण लगा दिया और यहाँ की मस्जिदों और भव्य इमारतो को बेदर्दी के साथ तोडा | आज जौनपुर में जो खंडहर मिला करते हैं वो सभी इब्राहीम लोधी के ज़ुल्म की कहानी कहते हैं | यहाँ शाही पुल से पहले सड़क किनारे राखी एक गज सिंह की मूर्ति अपने आप में जौनपुर के इतिहास की एक ऐसी कहानी कह रही है जिसे आज तक कोई सुलझा नहीं पाया |


 आज़मगढ़ शहर १८१८ में जौनपुर के अधीन कर दिया गया था जिसे १८२२-३० में अलग कर दिया गया |जौनपुर शहर का नाम जौनपुर अपने संस्‍थापक जूना शाह के नाम पर सन् 1360 में रखा गया। मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने इसे शिराज़ ऐ हिन्द के खिलात से नवाज़ा | जनपद जौनपुर वाराणसी मण्‍डल के उत्‍तरी- पश्‍चि‍मी भाग में स्‍थि‍त है जिसका  भू-भाग 25.24 और 26.12 के उत्‍तरी अक्षांश तथा 82.7 और 83.5 पूर्वी देशान्‍तर के मध्‍य में है। यह समुद्र सतह से 261-290 फीट की उचॉई पर बसा हुआ है। गोमती एवं सई यहॉ की प्रमुख एवं अनवरत बहने वाली नदि‍यॉ है। इसके अति‍रि‍क्‍त वरूणा, बसुही, पीली, मामुर एवं गांगी यहॉ की छोटी नदि‍यॉ है। यहाँ के ऐतिहासिक स्थलों के करार बियर का मंदिर,शीतला चौकिय, मैहर देवी का मदिर, बड़े हनुमान का मंदिर ,शाही किला, बड़ी मस्जिद, अटला मस्जिद , खालिस मुखलिस मस्जिद,झझरी मस्‍जि‍द-, लाल दरवाज़ा, शाह पंजा ,हमजापुर का इमामबाडा ,सदर इमामबाडा ,बारादरी ,मकबरा ,राजा श्री कृष्‍ण दत्‍त द्वारा धर्मापुर में निर्मित शिवमंदिर, नगरस्‍थ हिन्‍दी भवन, केराकत में काली मंदिर, हर्षकालीन शिवलिंग गोमतेश्‍वर महादेव (केराकत), वन विहार, परमहंस का समाधि स्‍थल(ग्राम औका, धनियामउ), गौरीशंकर मंदिर (सुजानगंज), गुरूद्वारा(रासमंडल), हनुमान मंदिर(रासमंडल), शारदा मंदिर(परमानतपुर), विजेथुआ महावीर, कबीर मठ (बडैया मडियाहू) आदि महत्‍वपूर्ण है।


जौनपुर शहर की 6 फीट लम्बी मूली ,जमैथा का खरबूजा बहुत मशहूर है | यहाँ की बेनीराम की इमरती देश विदेश तक जाती है | तम्बाकू और मक्के की खेती यहाँ अधिक होती है |सूती कपडे ,इत्र और चमेली के तेल के उद्योग के लिए जौनपुर बहुत प्रसिद्ध है |

गंगा गोमती के दोनो तटो पर बसा जौनपुर वर्तमान में अपनी 6 तहसीलों एवं 4038 वर्ग कि‍0मी0  क्षेत्रफल के साथ उत्‍तर प्रदेश के सबसे बड़े जि‍लो में है इसमे 2 लोकसभा क्षेत्र, 9 वि‍धान सभा क्षेत्र, 6 तहसील एवं 21 वि‍कास खण्‍ड सम्‍मि‍लि‍त है।

Sunday, August 17, 2014

आज की शाम शहीदों के नाम |

आज की शाम शहीदों के नाम |

सेन्टजाॅन्स के बच्चों ने आरम्भ है प्रचण्ड है, 
हैदरगंज के ‘‘राधा ढूढ़ रही कहीं मेरा श्याम देखा ,
फ्रेण्ड डांस द्वारा आई लव माई इंडिया,
डेलिम सनबीम द्वारा सारे जहां सं अच्छा हिन्दुस्तां हमारा,
जनक कुमारी उ0मा0वि0 द्वारा सर पे हिमालय का छत्र है, 
मार्सल आर्ट द्वारा चक दे इंडिया,

कार्यक्रम प्रस्तुत कर उपस्थित जनों को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। जिलाधिकारी सुहास एलवाई, पुलिस अधीक्षक पवन कुमार, कार्यक्रम संयोजक डिप्टी कलेक्टर श्रीमती ऋतु सुहास, अजय सिंह शिक्षक मोहम्मद हसन डिग्री कालेज ने बच्चों के कार्यक्रम से अहलादित होकर स्वयं देशभक्ति गीत प्रस्तुत कर वाहवाही लूटी।





Friday, August 15, 2014

कैसा रहा स्वतंत्रता दिवस २०१४ जौनपुर में ?

देश के अग्रणी शिक्षण समूह श्री शारदा ग्रुपऑफ़ इंस्टीट्यूशंस के गोसाईंगंज स्थित परिसर में देश का अरसठवां स्वतंत्रता दिवस पूर्ण उत्साह के साथ हर्षोल्लासपूर्वकमनाया गयाI समारोह में संस्था समूह के युवा, सक्षम और ऊर्जावान वाईस चेयरमैन श्री निर्मेश सिंह छात्र – छात्राओं के उत्साहवर्धन हेतु स्वयं उपस्थित थे I संस्था परिसर में समस्त शिक्षकगणों, अशैक्षणिक स्टाफ और छात्र – छात्राओं की उपस्थिति में संस्था के निदेशक डॉ० शिबनाथ बैनर्जी के द्वारा किया गया I छात्रों को अपने संबोधन में डॉ० बैनर्जी ने कहा कि यह हम सबका पवित्र उत्तरदायित्व है कि हम स्वयं के उस देश का नागरिक होने पर गर्व करें जिस देश का इतिहास और संस्कृति इतनी समृद्ध है I उन्होंने देश के उन अमर शहीदों को भी नमन करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने अपने जीवन को हँसते हुए बलिदान कर दिया ताकि आने वाली पीढियां स्वतंत्रता की खुली हवा में सांस ले सकें I


उन्होंने छात्रों को इस अत्यंत कठिनाई से प्राप्त हुई स्वतंत्रता का सम्मान करने के सीख देते हुए कहा उन्हें अपनी स्वतंत्रता को व्यर्थ में मिली हुई न समझते हुए अपने देश के लिए और महिला सशक्तिकरण के लिए काम करना चाहिए I उद्बोधन के अंत में उन्होंने छात्र – छात्राओं से देश का एक ज़िम्मेदार नागरिक बनने की अपील कीIप्रख्यात करियर विशेषज्ञ और संस्था समूह के डीन प्रो० विवेक मिश्रा ने छात्रों को अपने सम्बोधन में कहा कि छात्र छात्राओं को अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए सदैव प्रयास करते रहना चाहिए I उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के साथ ही ज़िम्मेदारी भी आती है I हमें अपने देश के प्रति अपनी उसी ज़िम्मेदारी को समझते हुए उसका निर्वहन भी करना चाहिए क्योंकि हम सभी स्वतंत्रता का आनंद तो उठाते हैं किन्तु देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को अनदेखा कर देते हैं I उन्होंने कहा कि भारत एक सशक्त देश तभी बन सकता है जब हम महिलाओं का सम्मान करेंगे और देश में महिलाएं सशक्त होंगी I आगे उन्होंने कहा कि हम सब को स्वयं को स्वतंत्रता के योग्य सिद्ध करना होगा और एक अच्छा इंसान बनने के साथ साथ देश का एक ज़िम्मेदार नागरिक भी बनना होगा Iअंत में प्रो० मिश्रा ने कहा कि एकता में ही हमारी शक्ति निहित है और अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए हमें अपनी एकता को सुरक्षित रखना होगा I संस्था समूह के छात्र छात्राओं ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विविध रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किये जैसे कि देशभक्ति से ओतप्रोत भाषण, नुक्कड़ नाटक, समूह एवं एकल गान, समूह नृत्य और देशभक्ति कि कवितायें इत्यादि Iइस अवसर पास संस्था समूह के समस्त शैक्षणिक और अशैक्षणिक स्टाफ तथा छात्र छात्राएं उपस्थित थे I कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित छात्र छात्राओं तथा अतिथियों को मिठाइयां भी वितरित की गईं I


जौनपुर में स्वतंत्रता दिवस राष्ट्रीयता से ओत प्रोत माहौल में मनाया गया। सूबह आठ बजे डीएम सुहास एलवाई ने कलेक्ट्रेट  परिसर में झण्डा फहराया एसपी पवन कुमार नें पुलिस लाइन में ध्वजारोहण किया । इसके अलावा शहर से लेकर ग्रामीणाचंलो के स्कूलों निजी संस्थाओं में तिरंगा फहराया गया। अधिकांश विद्यालयों के छात्र छात्राओं नें सास्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर पूरे माहौल में देश भक्ति का माहौल कायम कर दिया। हर तरफ भारत माता की जयकारे गुंज रहा था। इस मौके पर डीएम ने छः स्वतंत्रता सेनाओं का सम्मान किया गया। इन सेनानियों को अंग वत्रम् और कलाई घड़ी भेट किया गया। उधर एसपी ने ध्वजारोहण के बाद अपने सम्बोधन के दौरान जनपद के समस्त नगरवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना दी। अधीकारीगणों द्वारा पुलिस लाइन में एक-एक वृक्ष लगाकर वृक्षारोपण किया गया। पुनः 09.00 बजे विद्यालय के विकलांग बच्चों को पुलिस अधीक्षक ने सरकारी आवास पर मिठाई बटवांकर उन्हें स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना दी। दौरान अपर पुलिस अधीक्षक नगर रामजीत सिंह यादव, पुलिस अधीक्षक ग्रामीण ओम प्रकाश पाण्डेय एवं क्षेत्राधिकारीगण, प्रतिसार निरीक्षक, उ0नि0गण तथा आरक्षीगण उपस्थित रहें। इस दौरान कर्मचारीगणों द्वारा उनके सराहनीय कार्य के लिए प्रोत्साहित भी किया गया। नगर के वेद कान्वेट स्कूल में पूरे उत्साह के साथ 15 अगस्त मनाया गया। स्कूल के प्रबंधक पवन श्रीवास्तव नें झण्डा रोहण किया।


  आर0एस0के0डी0पी0जी0 कालेज, जौनपुर में 68वाँ स्वाधीनता दिवस समारोह अत्यन्त उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ0 शिवप्रसाद ओझा ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया इसके उपरान्त समारोह को सम्बोधित करते हुए प्राचार्य जी ने सर्वप्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को नमन किया और कहा कि आजादी हमें बहुत त्याग और बलिदान के बाद मिली है, इसको सजोये रखना हम सभी देशवासियों का परम कर्तव्य है। प्राचार्य जी ने सभी शिक्षको से आहवान किया कि वे अपने अधिकार के साथ-साथ अपने कर्तव्य को भी समझे तथा छात्रों के सर्वागीण विकास के लिए पूरा प्रयास करें। समारोह में डाॅ0 आर0पी0ओझा ने राष्ट्रगीत सुनाकर सबको राष्ट्र भक्ति की भावना से सराबोर किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के समस्त शिक्षक एवं कर्मचारी व छात्र उपस्थित रहें। समारोह का संचालन डाॅ0 विष्णुचन्द्र त्रिपाठी ने किया।
मदरसा जामिया नासरिया जौनपुर 
कमर हसनैन दीपू सहारा ऑफिस में झंडा रोहन करते हुए 

खेतासराय(जौनपुर)।स्वतंत्रता दिवस की 67वीं वर्षगांठ इलाके में हर्षोल्लास के साथ मनाई गयी।सभी सरकारी तथा गैरसरकारी संस्थानों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। नेशनल चिल्ड्रेन स्कूल में प्रबंधक शीतला प्रसाद गुप्त, जेडी कान्वेंट में एसआई नरेशकुमार सिंह,आदर्श कन्या इण्टर कालेज में प्रबन्धक फैयाज अहमद आदर्श भारती महाविद्यालय एवं वीटी गर्ल्स कालेज में प्रबंधक अनिल उपाध्याय ने ध्वजारोहण किया।
इस अवसर पर नेशनल चिल्ड्रेन स्कूल के बच्चों ने देशभक्ति से ओतप्रोत कार्यक्रम प्रस्तुत किया।
मुंगराबादशाहपुर(जौनपुर)।स्वतंत्रता दिवस की 67 वीं वर्षगाठं इलाके मे हर्षोल्लास के साथ मनायी गयी।सभी सरकारी गैरसरकारी संस्थानो मे राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। विकास खण्ड पर ब्लाक प्रमुख श्रीमती हेमलता सिह, नगरपालिका पर चेयरमैन कपिलमुनि, थाना मुंगरा पर थानाध्यक्ष आशुतोष तिवारी, थाना पंवारा पर एसओ आलमगीर, पीएचसी मंुगरा पर प्रभारी डा. पंकज तिवारी, सार्वजनिक इण्टर कालेज मे प्रिन्सिपल वी.के.सिंह, सार्वजनिक डिग्री कालेज मे प्रिन्सिपल डा.बी.के.सिह, संत पंचमदास इण्टरकालेज पर प्रबन्धक राजाराम तथा प्राथमिक विद्यालय सटवां पर पत्रकार नानकचंद्र त्रिपाठी ने ध्वजारोहण किया।



कजगांव का ऐतिहासिक कजरी मेला |

जफराबाद क्षेत्र के कजगांव (टेढ़वां बाजार) की ऐतिहासिक कजरी जो क्षेत्रीय बुजुर्गां के अनुसार लगभग 85 वर्षों से लगती चली आ रही है जिसमें टेढ़वां के लोग राजेपुर गांव में शादी करने का दावा पेश करते हैं और राजेपुर गांव के लोग टेढ़वां में शादी करने का सपना संजोकर बारात लेकर आते हैं। बाजार के अन्त में दोनों गांव के बीच स्थित पोखरे पर राजेपुर की बारात पूर्वी छोर और कजगांव की बारात पश्चिमी छोर पर बाराती, हाथी, घोड़ा, ऊंट तथा दूल्हे के साथ द्वार पूजा के लिये खड़ी हो जाती है। एक-दूसरे पर दोनों तरफ से मनोविनोदी आवाज में जोर-जोर बाराती और कभी-कभी दूल्हा भी चिल्लाने लगता है कि दूल्हन दे दो, हम लेकर जायेंगे। यह क्रम घण्टों चलता है। यदि बीच में पोखरा न हो तो शायद आपस में भिड़ंत भी हो सकती है लेकिन 85 वर्षों में कभी भी ऐसी कोई बात नहीं हुई।


महीनों पहले से जहां एक गांव के नागरिक दूसरे गांव के लोगां से मजाक शुरू कर देते हैं, वहीं कजरी मेला समाप्त होने के बाद मजाक एक वर्ष के लिये बंद होकर अगले वर्ष तक के लिये समाप्त सा रहता है। मेला में जहां एक ओर दोनों गांव के बाराती एक-दूसरे से मजकिया लहजे में जोर-जोर से वार्ता करते हैं, वहीं दूसरी ओर गांव ही नहीं, जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आये लोग इस काल्पनिक बारात में शामिल होकर मेला का आनन्द लेते हैं जहां खाद्य पदार्थों के अलावा घरेलू सामानों की जमकर खरीददारी भी की जाती है।


    मेले में सुरक्षा की दृष्टि से भारी संख्या में पीएसी व पुलिस के जवानों के अलावा तमाम थानाध्यक्ष भी डटे रहे तथा सिविल डेªस में भी पुलिसकर्मी चक्रमण करते नजर आये। कुल मिलाकर यह मेला पूरी तरह आपसी सौहार्द एवं परम्परागत ढंग से सम्पन्न हो गया और दोनों तरफ के दूल्हे इस वर्ष भी शादी न करने में असफल रहने का मलाल लेकर बगैर दूल्हन अगले वर्ष की आस लिये लौट गये।


लगभग 85 वर्षों का इतिहास संजोये जफराबाद क्षेत्र के कजगांव (टेढ़वां बाजार) स्थित पोखरे पर राजेपुर और कजगांव की ऐतिहासिक बारातें आयीं जिसमें हाथी, घोड़े, ऊंट पर सवार बैण्ड-बाजे की धुन पर बाराती घण्टों जमकर थिरके|

 इस वर्ष रोमांच रोमांश और अश्लीलता से भरपूर कजगांव का कजरी मेला आज सम्पन्न हो गया। इस ऐतिहासिक मेले में परम्परा के अनुसार दोनो गांव से करीब एक दर्जन से अधिक दुल्हे हाथी घोड़े पर सवार होकर मेला स्थल पर पहुंचकर एक दूसरे से लड़की विदा करनें का इशारा किया लेकिन इस बार भी दूल्हे बगैर दुल्हन के ही लौट गये।

जौनपुर जिले के सिरकोनी ब्लाक के कजगांव और राजेपुर गांव के बीच लगने वाले इस मेले का जौनपुर समेत आसपास के जिले के लोगो को पूरे वर्ष इंतजार रहता है। भादो माह के छठवे दिन इलाके में भारी जन सैलाब उमड़ पड़ता है। कजगांव से हाथी घोड़े पर सवार होकर करीब आधा दर्जन दूल्हे बैण्ड बाजे के साथ तालाब किनारे पहुंचते हैं इतने ही दुल्हे राजेपुर गांव से आते हैं। दोनो तरफ से एक दूसरे से दुल्हन विदा करने का इशारा करते हैं। इसी बीच दोनो तरफ अश्लील हरकते होती है लेकिन कोई बुरा नही मानता। इस नजारे का लुत्फ उठाने के लिए हजारों लोगों उपस्थित होते हैं।

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