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    शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

    ईसा के छः सौ वर्ष पूर्व से आज तक का शाही किले और उस स्थान का इतिहास |

    जौनपुर के शाही किले का नाम सुनते ही इसकी एक जानी मानी पहचानी सी तस्वीर नज़रों के सामने आ जाती है जो एक विशालकाय और गुम्बदों की शक्ल में है और यह कह दिया जाता है की इसे १३६१ ई में फ़िरोज़ शाह तुगलक ने बनवाया था लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं की इस किले में ईसा से छे  सौ वर्ष पूर्व से  ले के अंग्रेजों के खिलाफ १८५७ तक की जन क्रांति का इतिहास रचा बसा  है | यह किला तुगलक से ले के शार्की और मुग़ल से ले के अंग्रेजों तक के राज का  गवाह है | इस किले ने वजूद में आने के बाद न जाने कितनी करवटें ली और  आज भी इस किले में उन सभी के निशानात साफ़ तौर पे मिला करते हैं |


    शाही किला जिसे फ़िरोज़ शाह तुगलक ने बनवाया 
    अभी कुछ दिनों पहले यहाँ की  खुदाई में ईसा से छे  सौ वर्ष पूर्व के अवशेष उस स्थान पे मिले हैं  जहां आज यह किला बना हुआ है  लेकिन उसके बाद से १३६२ तक उस इलाके का  इतिहास  सामने नहीं आ सका है | लेकिन जो इतिहास सामने है वो इस इस प्रकार  है कि इस ऐतिहासिक किले का र्निर्माण सन् 1362 ई. में फिरोजशाह तुगलक ने कराया।  यह किला बहुत बार टूटा और बना और इसमें बने हुयी मस्जिदें द्वार, हमाम इत्यादि एक ही दौर के बने हुए नहीं हैं | यह किला अपने आप में जौनपुर का पूरा इतिहास समेटे हुए हैं जहां खुदाई में ईसा से छः सौ वर्ष पूर्व  के खंडहर भी मिले फिर फ़िरोज़ शाह तुगलक के दौर में (सन् 1362 ई) इसका निर्माण हुआ उसके बाद शार्की राज्य आया और उस दौर में यहाँ एक मस्जिद ,स्नान गृह और मदरसा बना जिसका दौर १३६७ ई कहा जाता है जो मस्जिद में लगे  शिलालेख में दर्ज है |
    इस का निर्माण मुग़ल बादशाह अकबर के दौर में हुआ 

    शार्की दौर के बाद मुग़ल काल आया और इस  किले के मुख्य द्वार का निर्माण सन् 1567 ई. में सम्राट अकबर ने कराया था।  और इस गेट के दरवाज़े पे एक खम्बा लगा है जिसे बादशाह शाह आलम के कोतवाल १७६७ ईस्वी (११८० हिजरी ) में लगवाया था और इस् पे लिखा शिलालेख यह बताता है की उस समय यहाँ पे हिन्दू थे जो राम गंगा त्रिवेणी की क़सम खाते थे और मुसलमान में शिया और सुन्नी दोनों थे |
    मस्जिद जिसका निर्माण शार्की दौर में हुआ 




    हम्माम जिसका निर्माण शार्की दौर में हुआ |

    इसके बाद यह सन १८५७ से पूर्व ही राजा इदारत जहां के हाथ में रहा और १८५७ में अंग्रेजों के खिलाफ पहली जनक्रांति के युद्ध में इसमें बहुत कुछ तोड़ फोड़ हुयी जिसमे इस किले की पश्चिम की दीवार ध्वस्त हो गयी और तब से आज तक यह ऐसा ही बदहाल है | इस किले में जो कब्रें बनी हैं वो राजा इदारत जहां के सिपहसालारों की हैं और उनके बारे में भी तरह तरह की किवदंतियों मशहूर है लेकिन यह भी सत्य है की उनका किले के पत्थरों पे बना होना उनकी अहमियत को दर्शाता है | डॉ दिलीप जूरी जज जौनपुर का तो कहना है की उन्होंने देखा है की सुबह सुबह एक सांप कब्र के सामने पहरा देता है | 


    इनमे कितनी सच्चाई है यह इतिहास तो नहीं बता सकता केवल इस सत्य के की यह राजा इदारत जहां के सिपाह्सालार थे जो अंग्रेजों से युद्ध में मारे गए |

    इस किले के बारे में यह भी  मशहूर है की राजा दशरत के समकालीन युग में यहाँ एक दैत्य करार बीर रहता था जिसका वध श्री राम ने किया था और उसके महल को तहस नहस कर दिया था जिसके टुकड़े पूरे शहर में बिखरे हुए थे | जब फ़िरोज़ शाह को यह किला बनवाना हुआ तो उन्ही टुकडो को जमा करके यह किला बना और आज भी करार बीर मंदिर इस के गोमती नदी वाले किनारे पे मौजूद है | इतिहास ने इसकी भी पुष्टि नहीं ही है लेकिन जहां यह किला फ़िरोज़ शाह  ने बनवाया वो स्थान ऐसा है जिसने ईसा पूर्व से ले के १८५७ में अंग्रेजों के खिलाफ पहली जनक्रांति के युद्ध का दौर देखा है |



    लेख कॉपी राईट ....एस एम् मासूम 



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