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    शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

    बनारस राज्य के दीवान अधिकतर जौनपुर के सय्यिद हुआ करते थे|

    जौनपुर का इतिहास शाही घरानों और ज़मींदार घरानों से भरा पड़ा है | बहुत से  घराने ऐसे हैं जो  देश के दुसरे हिस्सों में या विदेश में जा के बस गए लेकिन बहुत से ऐसे घराने से जुड़े लोग आज भी जौनपुर में रहते हैं | ऐसा ही एक घराना है खान बहादुर दीवान काशी नरेश अली जामिन का जिनके घरवाले आज भे कजगांव और पानदरीबा जौनपुर में रहते हैं लेकिन अधिकतर लोग जौनपुर से बाहर चले गए |

    इस बार लखनऊ में मेरा मिलना हुआ खान बहादुर दीवान काशी नरेश अली जामिन की बेटी रबाब जामिन से  जो  कनाडा  में  रहती है लेकिन सर्दियों में लखनऊ चली आती हैं और उसी दौरान अपने घर कजगांव जौनपुर भी आना जाना हुआ करता है | उन्होंने अपने पिताजी के बारे  में  अपनी किताब "A Family saga " ,Published by Rabab Zamin from Canada. में लिखा है |

      सय्यद  अली जामिन का जन्म सन १८८४ में हुआ जो जौनपुर  कजगांव के  रहने वाले थे | कजगांव  का पुराना नाम  सदात मसौंडा था | खान बहादुर अली जामिन उस घराने से ताल्लुक रखते थे जिसके पुरखे हमेशा से काशी नरेश के यहाँ उच्च पदों पे रहे और  बनारस स्टेट  के काम काज में अहम् भूमिका निभाते रहे थे |

    उन्होंने अपना करियर डिप्टी कलेक्टर ही हैसीयत से शुरू किया और सन १९३९ में काशी  नरेश राजा आदित्य नारायण सिंह ने अली जामिन को दीवान काशी  नरेश बना दिया | अपने अंतिम समय में राजा आदित्य नारायण सिंह ने दीवान अली जामिन साहब को बुलाया और अपने १२ साल के पुत्र विभूति नारायण का हाथ उनके हाथ में दे दिया | जुलाई १९47 में विभूति नारायण  के हाथ में काशी  की सत्ता दे दी गयी |

    १९४८ में खान बहादुर दीवान काशी नरेश अली जामिन को  रामनगर में अपने भाषण के दौरान दिल का दौरा पड़ा उसके बाद अपनी खराब सेहत के कारण उन्होंने  त्यागपत्र दे दिया और मुरादाबाद अपने परिवार के साथ रहने लगे ,जहां उनका देहांत सन १९५५ में हुआ |



    16 सितम्बर १९४८ को दीवान  काशी नरेश अली जामिन के त्यागपत्र देने के बाद हादी अखबार ने लिखा बनारस राज्य एक हिन्दू राज्य होने के बाद भी अधिकतर वहाँ के दीवान जौनपुर के सय्यिद हुआ करते थे जिनके बनारस स्टेट में बहुत अधिक अधिकार प्राप्त थे और स्येद अली जामिन  उनमे से अंतिम दीवान थे |

    आज भी जौनपुर का यह सय्यिद ज़मींदार घराना जौनपुर के कजगांव में और पानदरीबा में रहता है जिसके अधिकतर लोग रोज़ी रोटी के सिलसिले में देश के बहार अन्य शहरों में और अन्य देशों में बस गए हैं | यह सभी लोग वर्ष में एक बार अपने वतन कजगांव और पान दरीबा जौनपुर  अवश्य आते हैं जहां उनका पुश्तैनी घर और कुछ रिश्तेदार रहा करते हैं |

     अब जब भी रबाब जामिन लखनऊ और जौनपुर आती हैं तो उन्हें बहुत कुछ बदला बदला लगता है | न अब वो काशी के रजवाड़े रहे और न वो लोग जिन्हें रबाब जामिन खुद अपनी आँखों से देख चुकी हैं | उनके अनुसार अब तो जब वो बनारस रामनगर जहां उनका बचपन गुज़रा गयीं तो कोई उन्हें पहचान ही नहीं सका | उदास आँखों से रबाब जामिन बार बार  कहती हैं "ना  वो घर रहा न वो लोग"

    आप भी सुनें रबाब जामिन से बात चीत के अंश |

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