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    बुधवार, 31 दिसंबर 2014

    पं. भगवती दीन तिवारी की जयंती पर विशेष |

     पं. भगवती दीन तिवारी की जयंती पर विशेष |

    तारीख 16 मार्च 1931,स्थान टाउनहाल जौनपुर का मैदान। गोधूलि बेला में एक नौजवान सैकड़ो देशभक्तों के बीच पूरे जोश और बुलंद आवाज के साथ ब्रितानी हुकमत के खिलाफ जहर उलग रहा था। यह सहज किंतु साहसिक प्रतिकार था। इसी दिन अंग्रेज शासकों ने सशस्त्र क्रांति के जरिए भारत माता को दासता की बेडि़यों से मुक्त कराने को सिर पर कफन बांधकर निकले सरदार भगत सिंह सुखदेव और उनके साथियों को फांसी पर लटका दिया था। यह नौजवान कोई और नहीं, पं. भगवती दीन तिवारी थे, उनके मंुह से निकल रहे एक-एक शब्द उनके दिलों की चिनगारी को शोलों का रूप दे रहे थे जो मातृभूमि को स्वाधीन किए जाने के आंदोलन में गोरे शासकों के खिलाफ  कमर कसे हुए थे। जिले  के इसी अग्रणी स्वाधीनता सेनानी की आज जन्मतिथि है।
       
        पिछली शताब्दी के प्रारंभ में जनवरी सन् 1900 में जिले के पश्चिमी छोर पर स्थित गांव शंकरगढ़ (अटरा) में पं. राम स्वरूप तिवारी के घर एक बालक ने जन्म लिया। यही बालक कालांतर में पं. भवगती दीन तिवारी के नाम से विख्यात हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गांव की पाठशाला में हुई। संेट्रल हिंदू स्कूल वाराणसी और कांशी हिंदू विश्वविद्यालय से उन्होने उच्च शिक्षा व विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त की। सन् 1920 में जब स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ने लगा तो देश भक्ति की भावना से ओत-प्रोत 20 बरस के पं. भगवती दीन तिवारी भी इसमें कूद पड़े। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के साथ ही वह वकालत भी करने लगे। वकालत पेशे को उन्होंने धर्नाजन का साधन न बनाकर देश की सेवा व भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने का माध्यम बनाया।

        टाउन हाल के मैदान में हुई  सभा की अध्यक्षता करते हुए ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ आग उगलने वाले पं. भगवती दीन तिवारी अंग्रेज शासकों की आंखों की किरकिरी बन गए। 1922 में कांग्रेस के स्वयं सेवक के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत करने वाले भगवती दीन तिवारी 1928 में जिला कांगेस के खजांची और 1931 में मंत्री  बनाए गए। 1939 में जिला कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के साथ ही उनकी जेल यात्रा का सिलसिला चल पड़ा। वे देश के आजाद होने तक जिला कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। जेल के भीतर से ही वह स्वाधीनता सेनानियों के दिलों में देशक्ति की संजीवनी फूंकते रहे।

        देश आजाद हुआ। पं. भगवती दीन तिवारी विकास परिषद के अध्यक्ष बनाए गए। जनपद  के विकास और नागरिक आपूर्ति सहित तमाम प्रमुख कार्य तब इसी परिषद की देखरेख में होता था। सन् 1952 में कांग्रेस पार्टी ने जौनपुर  सदर पश्चिमी क्षेत्र  से उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया और वे भारी बहुमत से विधानसभा सदस्य निर्वाचित हुए। 1962 में वे जिले के गड़वारा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। बाद में वे कस्तूरबा ट्रस्ट आचार्य विनोवा भावे के भू- दान ट्रस्ट व गांधी शताब्दी समारोह का अध्यक्ष पद सफलतापूर्वक संभाला। उच्चादर्शो व मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठा के कारण जनता के मन में उनके लिए अपार आदर और स्नेह रहा। वे जीवन पर्यतं कांग्रेस के निष्ठावान सिपाही बने रहे हालांकि पार्टी में नैतिक मूल्यों के गिरावट पर बोलने से भी कभी नहीं चूके।

        गांधी दर्शन में पूर्ण आस्था रखने वाले पं. भगवती दीन तिवारी के जीवन का संबल उन्हीं का मूलमंत्र सत्य व अहिंसा रहा। निज  स्वार्थो के लिए कभी भी उन्होंने  अपने व्यक्तित्व, व्यक्तिगत संबंधों और राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल नहीं किया। पं. जवाहर लाल नेहरू, लाल  बहादुर शास्त्री, पं. कमला पति त्रिपाठी, पं. नारायण दत्त  तिवारी, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन  जय प्रकाश नारायण  जैसी महान विभूतियों का सामिप्य प्राप्त था। उन्हेंने अनके विद्यालयों की स्थापना की जो आज भी संचालित हो रहे है। ऐसे  महान कर्मयोगी के प्रेरक व्यक्तित्व व देश के प्रति सम्पूर्ण भाव से प्रेरित होकर उनके पौत्र पंडित रत्नेश तिवारी महान  समाजसेवी बने जिनको समाज आज भी याद करता है तथा मौजूदा समय में इनकी पुत्र वधु श्रीमती गिरिजा तिवारी समाजसेवा में लगी हुई है  आज वो हमारे बीच भले ही न हों किंतु उनके प्रेरक व्यक्तित्व व देश के प्रति समर्पण भाव मौजूदा और आने वाली पीढ़ी के लिए पथ प्रदर्शक का काम करता रहेगा।
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