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    गुरुवार, 16 अगस्त 2018

    जौनपुर में तादात के हिसाब से ९०००० शिया मुस्लिम यहां बसे हुए है ।

     जौनपुर को शीराज़ ऐ हिन्द भी कहा गया है और यह एक शतक तक शार्की राज्य की राजधानी भी  रह चुका है । शर्क़ी समय में जौनपुर में बहुत से इमामबाड़े भी  बने जो आज भी अच्छी हालत में है ।  जौनपुर  में लखनऊ के बाद सबसे अधिक शिया रहते है और तादात के  हिसाब से ९०००० शिया मुस्लिम  यहां बसे हुए है ।

    ज़ुल्जिनाह
    यहाँ मुहर्रम आते ही अज़ादारी का जोश लोगों में दिखने लगता है इमामबाड़े सज जाते हैं, नौहा, मजलिस और अज़ादारी जुलुस हर दिन दिखने लगते हैं । कहा जाता है की ये शहर बग़दाद की तरह ही बसाया गया था जिसे लोधी वंशज ने तोड़ दिया फिर भी आज यहां अज़ादारी कर्बला से काम नहीं हुआ करती ।

    जौनपर में अज़ादारी की जड़ें १३६० से भी पुरानी हैं । फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के समय में बहुत से अज़खाने यहां बने । मोहल्ला नसीर खान के रहने वाले हज़रत मौलाना मक़दूम सय्यद अली नसीर ने १३६१ AD में एक अज़खाना बनवाया जो आज भी छतरीघाट में  मौजूद है लेकिन अपनी  पुरानी हालत में नहीं है ।

    छतरीघाट का इमामबाड़ा
    उसके बाद एक इमामबाड़ा फातिमा बीबी उर्फ़ बहवा बेगम ने बनवाया जिसे आज दालान के इमामबाड़े के नाम से जाना जाता है और आज भी अच्छी हालत में है । ये बाजार भुआ इलाक़े में पड़ता है । फातिमा बीबी उर्फ़ बहवा बेगम ज़रत मौलाना मक़दूम सय्यद अली नसीर के खानदान से थीं और इस इमामबाड़े के लये ज़मीन शाहज़ादा नसीरुद्दीन मुहम्मद तुग़लक़ ने  दी थी ।

     इब्राहिम शाह शर्क़ी (१४००-१४४०)ने एक इमामबाड़ा बनवाया जो आज भी बड़ी मस्जिद से सटा हुआ बना है जिसका नाम था "ख़ानक़ाह नूहगरान " और इब्राहिम शाह शर्क़ी की क़ब्र पे उसकी वसीयत के मताबिक एक ताज़िया रखा जाता था ।

     इब्राहिम शाह शर्क़ी के बेटे महमूद  शाह शार्की(११४०-१४५७) ने एक इमाम बाद बेगम गंज इलाक़े में बनवाया जिसे आज सादर इमामबाड़े के नाम से जाना जाता है । सुलतान महमूद शाह की बीवी --बीबी राजे ने इसी इस इमामबाड़े से लग के एक मस्जिद बनवायी बनवायी और इसका इंचार्ज  जनाब सय्यद अली दावूद को बनाया जिनकी क़ब्र आज भी सददलली पुर (चित्रसारी ) जौनपुर में मौजूद है ।

     अकबर के समय में अज़ादारी को एक नया आयाम मिला । महाराजा अकबर के एक गवर्नर मुनीम खान खाना ने कटघरा इलाक़े में "ख़ानक़ाह ज़िक्रण " का निर्माण करवाया  ।

    ईरान के शाह तमसक की फ़ौज के एक ओहदेदार सय्यद अहसन अखविंद मीर हुमायूँ बादशाह के साथ भारत आया और जौनपुर इतना भाया की यहीं बस गया ।  सय्यद अहसन अखविंद मीर ने कई इमामबाड़े बनवाए और अज़ादारी को बढ़ावा दिया और मुहर्रम के महीने में ज़ुल्जिनाह निकलवाया जो भारत का पहला ज़ुल्जिनाह कहलाया ।

                    
     सय्यद अहसन अखविंद मीर की नस्ल से राजा इदारत जहा जिन्होने जौनपुर और महल में बहुत  से मस्जिद  और इमामबाड़े बनवाए ।  १८५७ की आज़ादी की लड़ाई का जौनपुर से पहला क्रांतिकारी थे राजा इदारत जहा जो १८५७ में जौनपुर ,आज़मगढ़ ,बनारस, बलिया, तथा मिर्ज़ापुर प्रबंधक थे ।

    इस प्रकार जौनपुर से भारत की आज़ादी की लड़ाई का पहला शहीद राजा इदारत जहा -हुसैनी था सय्यद था और शिया मुसलमान था ।
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