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    गुरुवार, 16 अगस्त 2018

    हमने इंसान को बनते हुए पत्थर देखा |--डॉ. प्रेम जौनपुरी

    हमने इंसान को बनते हुए पत्थर देखा |--डॉ. प्रेम जौनपुरी


    डॉ. प्रेमचंद्र विश्वकर्मा ( प्रेम जौनपुरी ) की  शक्सियत किसी तार्रुफ कि मोहताज नहीं | एक मशहूर गज़लकार के साथ साथ रीडर ,तिलकधारी विधि महाविद्यालय जौनपुर, डीन (अधिष्ठाता) विधि संकाय वी०बी०एस. पूर्वांचल विश्वविधालय भी हैं |
    डॉ. प्रेमचंद्र विश्वकर्मा ( प्रेम जौनपुरी ) का जन्म १८ जुलाई १९४९ में ग्राम पोस्ट कोहडा सुलतानपुर जिला जौनपुर में हुआ | इनकी शिक्षा जौनपुर और वाराणसी से हुई | आपने ऍल ऍल बी में गोल्ड मेडल लिया, ऍल ऍल एम् में बी. एच यु में टॉप किया और इसके बाद पी एच डी की | प्रेम जी ने जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया और सबसे अधिक जो मिला वो जौनपुर निवासीयों का प्रेम मिला |

    डॉ श्रीपाल सिंह क्षेम जी ने कहा था कि डॉ प्रेम जौनपुरी एक सफल गज़लकार हैं| उनके काव्य भाषा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उर्दू के शिखर को स्पर्श करने के साथ साथ हिंदी के भाव विचारों को भी अपनी रचनाओं में अवतरित करते हैं |

    इसी मंतव्य को प्रेम जौनपुरी जी कि यह पंक्तियाँ भी परिलक्षित करती हैं.

    फर्क खुद मिट जाएगा गर हिंदी उर्दू साथ हो,

    बस इसी से एकता का एक रास्ता मिल जाएगा |

    डॉ प्रेम जी ने आधुनिक परिस्तिथियों को अपनी गज़लों में प्रतिबिम्बित करने का पूर्ण प्रयास किया है | हिंदू मुस्लिम एकता के अतिरिक्त मानवीय मूल्यों को भी अपनी गज़लों में पूर्ण स्थान दिया है |

    कोई तुझसे करेगा प्रेम क्यूँ कर ,

    अगर शीरी तेरा लहजा नहीं है |

    .....डॉ श्रीपाल सिंह क्षेम

    डॉ प्रेम जौनपुरी कि गजलें सामाजिक सरोकारों से जुडी हुई दिखाई देती हैं | समाज में फैली बुराईयों को मिटने के लिए उनकी कलम कि धार हमेशा तेज दिखाई देती है |

    वही करता है क्यूँ गीबत हमारी,

    हमारे साथ जो रहता बहुत है |

    यह पानी कि तरह बहता बहुत है,

    गरीबो का लहू सस्ता बहुत है |

    डॉ प्रेम जौनपुर कि गजलें विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में छपती रहती  हैं और उनकी किताब

    लफ्ज़-लफ्ज़ आईना” तो बहुत ही लोकप्रिय है | जल्द ही यह किताब आपके सामने पेश कि जाएगी |

    कसीदा उर मंक़बत में भी डॉ प्रेम जौनपुरी साहब का कोई जवाब नहीं | मुसलमानों के चौथे इमाम जैनुल आबेदीन (ए.स.) की शान देखिये कैसे बयां कि है..

     नफरतों कि फ़ौज पर यलगार होना चाहिए |

    प्यार को चलती हुई तलवार होना चाहिए ||

    साहिबे-दिल साहिबे-इसार होना चाहिए |

    आबिद ए बीमार सा किरदार होना चाहिए ||

    हाथ में हो हथकड़ी और बेडियाँ हो पावों में |

    हौसलों में इसतरह झंकार होना चाहिए ||

    जब वुजू का वक्त आये ,खौफ से अल्लाह के |

    कंपकपी इस जिस्म में हरबार होना चाहिए ||

    आज भी तस्वीर है जिंदा मेरे शबीर कि |

    आज ज़िक्र ए आबिद ए बीमार होना चाहिए ||

    ‘प्रेम’ को गुज़रा ज़माना मंक़बत लिखते हुए |

    अब क़सीदागोई का हक़दार होना चाहिए ||



    हर दिल अज़ीज़ ,खुशमिजाज, डॉ प्रेम जौनपुर जी ने अपनी बात चीत में जो कह वो आपके सामने है आप भी सुनें ---प्रस्तुतकर्ता एस एम् मासूम



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    एस एम् मासूम

    Item Reviewed: हमने इंसान को बनते हुए पत्थर देखा |--डॉ. प्रेम जौनपुरी Rating: 5 Reviewed By: S.M.Masoom
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