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    रविवार, 16 नवंबर 2014

    गिरते नैतिक मूल्य, कारण और विश्लेषण --असद जाफ़र


    लेखक असद जाफर
    क्या कारण है की आज हमारी युवा पीड़ी निरंतर अपने नैतिक मूल्यों को खोती जा रही है? इस विषय पर अक्सर बहुत बार चर्चा सुनने और देखने को मिलती है, अगर हम अपने परिवार को लेकर आगे बढें, अपने आस पड़ोस को लेकर आगे बढ़ें तो हम भी इस बात से जरूर इतेफाक रखेंगे कि आज की जो हमारी युवा पीड़ी है और जो युवा पीड़ी आ रही है, उसमे जरूर कही न कहीं नैतिक मूल्यों की कमी नजर आती है, जैसे नैतिक मूल्य हमारे पूर्वजों के थे, हमारे माता पिता के थे। ये जो आज की पीड़ी है जिसमे मैं भी आता हूँ जरूर कही न कही हम अपना नैतिक मूल्य खोते जा रहे है और ये दर नित प्रतिदिन बढती जा रही है. जो संस्कार हमारे पूर्वजों के थे वो संस्कार हम अपनी नई पीड़ी को देने में कामयाब नही हो पा रहे है और मेरी नजर में इसके दोषी भी हम ख़ुद है, हमारा परिवार है, हमारे माँ बाप है।

    आज अपने घरों में दुनिया भर की कोमिक्स, कंप्यूटर गेम्स सी डी, फिल्मी गानों की दुनिया भर की सी डी बच्चे के कमरे में मिल जायेगी लेकिन सरदार भगत सिंह, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि मनीषियों की प्रेरणा श्रोत कहानियो की किताब घर से नदारद मिलेगी और यहाँ तक कि हम और आप ये कोशिश भी नही करते की बच्चो को उनके बारे में बताये और समाज को उनके योगदान के प्रति सत्य उजागर करे शायद हमारे पास समय ही नहीं है और न ही रूचि एकल परिवार में जहाँ पति पत्नी अपने व्यस्त दिनचर्या में एक मशीनी जीवन यापन कर रहे है। पहले यह ज़िमेदारी घर के बड़े बुज़ुर्ग बखूबी निभाते थे परन्तु बदलते परिवेश में अब उनका अस्तित्व शून्य हो गया है और उनकी रोक टोक भी बच्चो और उनके अभिवावकों को रास नहीं आती। अब समय यह आ गया है की आपसी मिल मिलाप में गिरावट और बच्चे अपने माँ-बाप और सगे भाई-बहनो के अलावा किसी और रिस्तेदार नातेदार को पहचाने की स्तिथि में नहीं है। आज हमारे बुरुगों की क्या स्तिथि दयनीय है।

    नैतिक मूल्यों में आयी गिरावट कोई एक दो दिनों में नहीं आई है यदि इतिहास को खंगाले तो पायेगे की इसको शुरुआत पहले विश्वयुद्ध के बाद सन् १९२० के दशक से शुरू हो गयी थी, प्रथम विश्व-युद्ध के बाद समाज में एक बदलाव देखा गया सभी लोग सुख-विलास के पीछे भागने लगे और उन पर अमीर बनने का जुनून सवार हो गया। ऐसे हालात में जितने भी पुराने उसूल और नैतिक सिद्धांत थे, उन सबको ठुकरा दिया गया। उनके बदले, लोग ‘सब चलता है’ रवैया अपनाने लगे। इतिहासकार, फ्रेड्रिक लूअस एलन कहते हैं: “पहले विश्वयुद्ध के बाद के दस सालों को ‘बेहूदगी का दशक’ कहना बिलकुल सही होगा। . . . पुराने ज़माने के बीतने के साथ-साथ, उसके वे सारे उसूल भी खत्म हो गए, जिनसे कुछ हद तक लोगों की ज़िंदगी खुशहाल थी और उनके पास जीने का एक मकसद था। यही नहीं, उनके रहते बदले दूसरे उसूलों को कायम करना हरगिज़ आसान नहीं था।”
    सन् १९३० के दशक में, पूरी दुनिया में महामंदी छा गयी और बहुत-से लोग गरीब हो गए। तब जाकर कहीं लोगों के होश ठिकाने आए और वे खुद पर काबू रखने लगे। मगर उस दशक के खत्म होते-होते, दुनिया-भर में एक और युद्ध छिड़ गया। वह पहले विश्वयुद्ध से भी बड़ा भयंकर था। वह था, दूसरा विश्वयुद्ध। देखते-ही-देखते, कई देश विनाश करनेवाले खतरनाक हथियार बनाने लगे। इससे दुनिया महामंदी की मार से उबर तो गयी, मगर साथ ही वह दुःख-तकलीफों और दहशत की ऐसी खाई में जा गिरी, जिसके बारे में शायद ही किसी ने कभी कल्पना की हो। दूसरे विश्वयुद्ध के खत्म होने तक सैकड़ों शहर खाक हो गए। जापान के दो शहरों पर एक-एक परमाणु बम गिराकर उन्हें पूरी तरह भस्म कर दिया गया! यातना शिविरों में लाखों लोगों को बहुत ही खौफनाक तरीके से मौत के घाट उतारा गया। इस युद्ध में करीब ५० लाख स्त्री-पुरुष और बच्चे मारे गए।
    दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान, जब चारों तरफ के हालात बहुत ही खराब थे, तब लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी से चले आ रहे सही-गलत के स्तरों मानक को मानने के बजाय, अपने मन-मुताबिक व्यवहार करने लगे। किताब प्यार, सेक्स और युद्ध—इनके बदलते उसूल, १९३९-४५ कहते है: “ऐसा लगता है कि लैंगिकता के मामले में जितने भी नियम थे, उन सभी को युद्ध के दौरान ताक पर रख दिया गया था। मैदाने-जंग में फौजियों को मर्यादा पार करने की जो छूट दी जाती है, वही छूट अब आम लोगों को भी दी जाने लगी। . . . युद्ध की वजह से हर जगह छाए तनाव और सनसनी में, नैतिकता उड़न-छू हो गयी। नतीजा, जिस तरह युद्ध के मैदान में इंसान की ज़िंदगी पल-भर की और दो कौड़ी की मानी जाती है, उसी तरह आम लोगों की ज़िंदगी की भी कोई कीमत नहीं रही।”


    युद्ध के वक्त, लोगों पर मौत का साया मँडरा रहा था। इसलिए वे किसी के भी साथ जज़बाती तौर पर गहरा लगाव रखने के लिए तरस रहे थे, फिर चाहे वह कुछ वक्त के लिए ही क्यों न हो। ब्रिटेन में रहनेवाली एक शादीशुदा स्त्री ने, उस समय सेक्स के मामले में दी गयी खुली छूट की सफाई में कहा: “असल में देखा जाए तो हम बदचलन नहीं थे, आखिर युद्ध जो चल रहा था।” एक अमरीकी सैनिक ने कबूल किया: “बहुत-से लोगों के मुताबिक हम बदचलन थे। पर हम करते भी तो क्या, आखिर हम जवान थे और हमारी मौत कभी-भी हो सकती थी।”
    उस युद्ध से बचनेवाले बहुत-से लोगों को गहरा सदमा पहुँचा, क्योंकि उन्होंने लड़ाई के वक्त अपनी आँखों से दिल-दहलानेवाली घटनाएँ देखी थीं। आज भी, कुछ लोगों की आँखों के सामने उन घटनाओं की ऐसी तसवीर उभर आती है, मानो वे फिर से घट रही हों। उनमें वे लोग भी शामिल हैं, जो युद्ध के समय बच्चे थे। इस वजह से कइयों का दूसरों पर से भरोसा उठ गया, साथ ही उन्होंने नैतिकता के बारे में अपनी समझ भी खो दी। अब उनके दिल में ऐसे किसी भी अधिकारी के लिए इज़्ज़त नहीं रही, जो अच्छे-बुरे के स्तर कायम करते हैं। इसलिए उनकी नज़र में सबकुछ पल-दो-पल का है, आज है तो कल नहीं।

    दूसरे विश्वयुद्ध के बाद, लोगों के लैंगिक कामों के बारे में कई अध्ययन चलाए गए। ऐसा ही एक अध्ययन सन् १९४० के दशक में अमरीका में चलाया गया और उस पर ८०० से भी ज़्यादा पेजों की एक रिपोर्ट छापी गयी, जिसका नाम था ‘किनज़ी रिपोर्ट।’ इस रिपोर्ट से क्या नतीजा निकला? बहुत-से लोगों में सेक्स के बारे में इतनी खुलकर चर्चा होने लगी, जितनी पहले कभी नहीं होती थी। हालाँकि बाद में पता चला कि उस रिपोर्ट में समलैंगिकता के और सेक्स के दूसरे घिनौने कामों में हिस्सा लेनेवालों की गिनती बढ़ा-चढ़ाकर बतायी गयी थी, फिर भी उस अध्ययन से एक बात ज़रूर सामने आयी। वह यह कि युद्ध के बाद से नैतिक मूल्यों का अचानक गिरना शुरू हो गया।

    कुछ समय तक, सही-गलत के स्तर को बरकरार रखने की पूरज़ोर कोशिश की गयी थी। जैसे, रेडियो से ऐसी बातें, साथ ही फिल्मों और टी.वी. कार्यक्रमों से ऐसे सीन हटाए जाते थे जो अश्लील होते थे। लेकिन ऐसा ज़्यादा समय तक नहीं चला। विलियम बेनेट, जो पहले अमरीका के शिक्षा विभाग के सचिव रह चुके थे, कहते हैं: “सन् १९६० के दशक तक, अमरीका सीधे और तेज़ी से एक ऐसे गर्त में गिरने लगा जिसे असभ्यता कहा जा सकता है।” और यही हाल कई देशों का था। आखिर, सन् १९६० के दशक में नैतिक मूल्य इतनी तेज़ी से क्यों गिरने लगे?
    उस दशक में ‘नारी मुक्ति आंदोलन’ शुरू हुआ। उसके फौरन बाद, लैंगिकता के मामले में एक बड़ी क्रांति आयी। साथ ही, नए नैतिक मूल्यों की शुरूआत हुई। इसके अलावा, ऐसी गर्भ-निरोधक गोलियाँ ईजाद की गयीं जो काफी असरदार थीं। इसलिए अब गर्भ ठहरने का डर नहीं रहा। इस वजह से स्त्री-पुरुषों के बीच, एक-दूसरे का साथ निभाने का वादा किए बगैर, लैंगिक संबंध रखना आम हो गया।

    उसी दौरान, अखबारवालों, फिल्म बनानेवालों और टी.वी. पर कार्यक्रम दिखानेवालों ने भी नैतिकता के मामले में ढील देना शुरू कर दिया। सालों बाद, ज़बीगन्येव ब्रेज़िनस्की ने, जो पहले अमरीका के राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के अध्यक्ष रह चुके थे, बताया कि टी.वी. कार्यक्रम क्या-क्या उसूल सिखाते हैं। उन्होंने कहा: “वे साफ-साफ बताते हैं कि अपने सुख-विलास को पूरा करना ही सबकुछ है। वे मार-पीटवाले और खून-खराबेवाले सीनों को ऐसे दिखाते हैं, मानो ये आम बात हों और वे एक-से-ज़्यादा लोगों के साथ सेक्स करने का भी बढ़ावा देते हैं।”

    सन् १९७० के दशक के आते-आते, वी.सी.आर. बहुत मशहूर हो गया। अब लोग चुपके से अपने घर की चार-दीवारी में रहकर ही उन गंदी और अश्लील फिल्मों को देख सकते थे, जिन्हें वे सिनेमा घर में देखने की जुर्रत कभी न करते। और आज, पूरी दुनिया में जिस किसी के पास कंप्यूटर है, वह इंटरनेट के ज़रिए सबसे घिनौनी किस्म की पोर्नोग्राफी देख सकता है।

    नैतिक मूल्यों के गिरने से जो अंजाम हुए हैं, उन्हें देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हाल ही में, अमरीका के एक जेलर ने कहा: “दस साल पहले जब गंदे मोहल्ले में पले-बढ़े नौजवान इस जेलखाने में आते थे, तो मैं उनसे सही-गलत के बारे में बात कर सकता था। मगर आजकल जो बच्चे आते हैं, उन्हें तो मालूम तक नहीं कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूँ।”

    नैतिकता के मामले में सही मार्गदर्शन पाने के लिए, हम दुनिया के चर्चों/मंदिरो के महंत और उल्मा के पास नहीं जा सकते। क्यों? क्योंकि वे, जिन धार्मिक पथचिन्हों पर चलते थे जिन सिद्धांतो का अनुसरण करते थे वे उसकी बुराइयों में शामिल हो गए। नतीजा समाज में बिखराव और और समाज में असमंजस की स्तिथि का निर्मित होना भी सामाजिक नैतिक मूल्यों के विघटन। बदलाव? यह बदलाव कौन ला सकता है और कैसे? आजकल घिनौने किस्म के मनोरंजन का मज़ा लेना दिनोंदिन आसान होता जा रहा है। किसी को आगे आना होगा और अपनी नैतिक ज़िमेदारी लेनी होगी ताकि और अधिक पतन को रोका जा सके।

    लेखक -असद जाफर

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