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    बुधवार, 29 जून 2011

    जौनपुर ..मादरडीह गांव के उत्खनन से खुल रहे अतीत के पन्ने

    आज -कल पुरातात्विक उत्खनन को लेकर जौनपुर चर्चा में है. और हो भी क्यों न ,जौनपुर के अतीत के पन्नों को जानने की उत्सुकता हर किसी को है.जिला मुख्यालय से लगभग ५५ किलोमीटर दक्षिण -पश्चिम में मुंगराबादशाहपुर के पास स्थित यह गांव जनश्रुति के अनुसार कभी भर राजाओं के निवास का केंद्र था.लगभग २ किलोमीटर की परिधि में फ़ैली यह ग्राम-पंचायतआज भी टीले पर ही अवस्थित है.गांव के बीच में ही डीह-बाबा का स्थान भी है जहाँ आज भी हर बरस मेला लगता है,उनकी पूजा होती है और उन्हें ग्राम देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है.
    इतिहास अनुसन्धान में अपनी उत्कट अभिलाषा के चलते मैं भी अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाया और उत्खनित स्थल का निरीक्षण करनें निकल पड़ा क्योंकि जौनपुर के अतीत के पन्नों को जानने की उत्सुकता मुझे कई दशकों से रही है. मेरे लिए यह गौरव की बात थी की इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुरातत्व विभाग में मेरे अग्रज रहे और अब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर डा.अनिल कुमार दूबे के नेतृत्व में यह उत्खनन कार्य सम्पन्न हो रहा था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुरातत्व विभाग में मेरे सहयोगी रहे और अब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पुरातत्व विभाग में रीडर डॉ दिनेश ओझा भी इसी अभियान में शामिल थे,यह मेरे लिए दुगुना उत्साह वाली बात थी.पुरातत्व सर्वेक्षण कर रही टीम के अगुआ डा.अनिल कुमार दूबे जी का कल ही फ़ोन आया कि बन्धु अब तो आ जाओ ...

    (उत्खनित स्थल को दिखाते डॉ.दिनेश ओझा और डॉ शिवाकांत तिवारी)



    यहाँ की मूर्ति के उत्खनन में कुषाण कालीन यक्ष देवता की मूर्ति प्राप्त हुई जिनकी पूजा उस काल में गांव अथवा नगर के रक्षक शक्तिशाली देवता के रूप प्रवेश द्वार पर होती थी।

    ( यक्ष देवता की मूर्ति के साथ प्रोफेसर अनिल कुमार दुबे)

    प्रोफेसर अनिल कुमार दुबे ने बताया कि कुषाण काल में गांव के रक्षक के रुप में यक्ष देवता का प्रचलन था।जिनकी स्थापना प्राय: गांव के प्रवेश द्वार अथवा जलाशयों के किनारे की जाती थी। कुषाण काल में महिलाएं धनधान्य समृद्धि एवं संतानों की रक्षा हेतु यक्ष देवता की पूजा करती थीं। गांव के अन्दर यक्ष देवता की स्थापना नहींकी जाती थी।

    सर्वेक्षण कर रही टीम को स्तूप के बगल बौद्ध विहार होने का संकेतक साक्ष्य मिल रहा है। बौद्ध भिक्षुओं को ठहरने के लिए कुषाण काल में बनी बौद्ध विहार की दीवाल के अवशेष मिले हैं।

    डॉ.एके दूबे के अनुसार स्तूप के चारो तरफ से खुदाई किया गया। जिससे स्तूप होना प्रमाणित हो चुका था, लेकिनफिर भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई थी। वह अनिश्चितता भी समाप्त हो गई, जब स्तूप की निचली सतह परचल रहे उत्खनन कार्य में बौद्ध विहार की अवशेष दीवाल प्राप्त हो गई। यह बौद्ध विहार कुषाण काल में बौद्ध भिक्षुओंको ठहरने के लिए बनाया गया था। स्तूप के बगल में ही बौद्ध विहार बने होने से यह कहा जा सकता है कि यह बौद्धस्तूप है।

    अब तक के उत्खनन से यह ध्वनित हो रहा है कि लगभग ढाई हजार वर्ष के आस-पास यहाँ नगरीय सभ्यता पुष्पित थी,संभव है की यह स्थान विशेष व्यापर -वाणिज्य का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव भी रहा हो .सब कुछ आगे प्राप्त होने वाले महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों पर निर्भर करता है.फौरी तौर पर इतने कम अध्ययन पर कुछ कह पाना उचित नहीं है.एक बात तय है कि पक्का निष्कर्ष प्राप्त करनें में अभी कई वर्ष लगेंगे.दो सप्ताह के उत्खनन में जो कुछ प्रकाश में आया है उसका कालक्रम कुषाणकालीन संस्कृति को ही प्रतिबिंबित कर रहा है......

    जारी......................


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