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    बुधवार, 6 जुलाई 2011

    भ्रष्ट आचरण -भ्रष्टाचारी सरकारी ही दिखते थे !


    भ्रष्ट आचरण -भ्रष्टाचारी
    सरकारी ही दिखते थे !
    आते -जाते पाँव थे घिसते
    “भ्रमर” सभी ये कहते थे !!
    ————————–
    सरकारी संग- प्राइवेट भी
    अब तो ताल मिलाये हैं !
    सोने पर कुछ रखे सुहागा
    उसकी चमक बढ़ाये हैं !!
    —————————
    गठ – बंधन नीचे से ऊपर
    खा-लो -भर लो -होड़ लगी !
    अपने प्रिय चमचों को भाई
    हर वर्ष -प्रमोशन दिलवाए हैं !!
    ————————————-
    रीति अनीति राह कोई भी
    भर कर लेकर ही आओ
    नहीं गधा- घोडा बन जाए
    खच्चर तुम – लादे जाओ !!
    ———————————–
    चपरासी कुछ लिपिक यहाँ भी
    मालिक बन कर बैठे हैं !
    नीति नियम धन ईमान लेकर
    अफसर रोते बैठे हैं !!
    ———————————-
    कुचले -दबे लोग भी कुछ हैं
    मेहनत-अनुशासन -खट मरते
    बाँध सब्र का- गर टूटा तो
    क्रांति – सुनामी लायेंगे !!
    शुक्ल भ्रमर ५ -६.७.2011
    ८.35 पूर्वाह्न -जल पी बी
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    2 comments:

    1. बहुत सुन्दर कविता .यथार्थ मूलक .-
      सरकारी संग प्राइवेट भी ,अब तो ताल मिलाये है ,
      सोने पर कुछ रखे सुहागा उसकी चमक बढाए है .
      बेहद अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई .
      "खामोश अदालत ज़ारी है ."-डॉ नन्द लाल मेहता वागीश .
      (पहली किश्त ). वाणी पर तो बंदिश है ,अब साँसों की बारी है ,
      खामोश अदालत ,ज़ारी है .
      हाथ में जिसके सत्ता है ,वह लोकतंत्र पर भारी है ,
      सभी सयानप गई भाड़ में ,चूहा अब पंसारी है .
      खामोश अदालत ज़ारी है .
      संधि पत्र है एक हाथ में ,दूजे हाथ कटारी है ,
      खौफ में औरत मर्द जवानी ,बच्चों की लाचारी है .
      खामोश अदालत ज़ारी है .
      (ज़ारी ....)
      सहभाव एवं प्रस्तुति :वीरेन्द्र शर्मा (veerubhai1947@gmail.com)

      veerubhai1947.blogspot.com

      जवाब देंहटाएं
    2. आदरणीय वीरू भाई जी हार्दिक अभिवादन बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ इस मुद्दे पर आप ने डॉ नन्द लाल वागीश जी कि सुनाई -मन खुश हो गया
      आभार आप का -रचना का समर्थन करने और प्रोत्साहन के लिए
      शुक्ल भ्रमर ५

      जवाब देंहटाएं

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