• Latest

    शुक्रवार, 31 मार्च 2017

    बेग़म अख्तर एक कभी ना भुलाई जाने वाली आवाज़ |


    बेग़म अख्तर के नाम से प्रसिद्ध, अख्तरी बाई फ़ैज़ाबादी (७ अक्टूबर १९१४- ३० अक्टूबर १९७४) भारत की प्रसिद्ध गायिका थीं, जिन्हें दादरा, ठुमरी व ग़ज़ल में महारत हासिल थी। उन्हें कला के क्षेत्र में भारत सरकार पहले पद्म श्री तथा सन १९७५ में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हें "मल्लिका-ए-ग़ज़ल" के खिताब से नवाज़ा गया था।उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में 7 अक्टूबर 1914 में जन्मी बेगम अख़्तर का बचपन के दिनों से ही संगीत की ओर रुझान था। वह पार्श्वगायिका बनना चाहती थी।
    उनके चाचा ने बेगम अख़्तर के संगीत के प्रति लगाव को पहचान लिया और उन्हें इस राह पर आगे बढने के लिये प्रेरित किया। बेगम अख़्तर ने फ़ैज़ाबाद में सारंगी के उस्ताद इमान ख़ाँ और अता मोहम्मद खान से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली। इसके अलावा उन्होंने मोहम्मद खान, अब्दुल वहीद खान से भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखा।








    Your Adsense ad script
    नाटकों में मिली शोहरत के बाद बेगम अख़्तर को कलकत्ता की ईस्ट इंडिया कंपनी में अभिनय करने का मौका मिला। बतौर अभिनेत्री बेगम अख़्तर ने 'एक दिन का बादशाह' से अपने सिने कैरियर की शुरूआत की लेकिन इस फ़िल्म की असफलता के कारण अभिनेत्री के रुप में वह कुछ ख़ास पहचान नहीं बना पाई। वर्ष 1933 में ईस्ट इंडिया के बैनर तले बनी फ़िल्म 'नल दमयंती' की सफलता के बाद बेगम अख़्तर बतौर अभिनेत्री अपनी कुछ पहचान बनाने में सफल रही। इस बीच बेगम अख़्तर ने अमीना, मुमताज बेगम (1934), जवानी का नशा (1935), नसीब का चक्कर जैसी फ़िल्मों मे अपने अभिनय का जौहर दिखाया। कुछ समय के बाद वह लखनऊ चली गई जहां उनकी मुलाकात महान निर्माता -निर्देशक महबूब खान से हुई जो बेगम अख़्तर की प्रतिभा से काफ़ी प्रभावित हुये और उन्हें मुंबई आने का न्योता दिया। वर्ष 1942 में महबूब खान की फ़िल्म 'रोटी' में बेगम अख़्तर ने अभिनय करने के साथ ही गाने भी गाये। उस फ़िल्म के लिए बेगम अख़्तर ने छह गाने रिकार्ड कराये थे लेकिन फ़िल्म निर्माण के दौरान संगीतकार अनिल विश्वास और महबूब खान के आपसी अनबन के बाद रिकार्ड किये गये तीन गानों को फ़िल्म से हटा दिया गया। बाद में उनके इन्हीं गानों को ग्रामोफोन डिस्क ने जारी किया गया। कुछ दिनों के बाद बेगम अख़्तर को मुंबई की चकाचौंध कुछ अजीब सी लगने लगी और वह लखनऊ वापस चली गईं।

    बेगम अख़्तर की कुछ मशहूर फिल्में 
    अमीना (1934)
    मुमताज बेगम (1934)
    रूप कुमारी (1934)
    जवानी का नशा (1935)
    नसीब का चक्कर (1936)
    अनारबाला (1940)
    रोटी (1942)
    दानापानी (1953)
    एहसान (1954)
    जलसा घर (1958)

    बेगम अख़्तर को मिले सम्मान और पुरस्कार
    सन 1968 में पद्म श्री
    वर्ष 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
    सन 1975 में पद्म भूषण



    क़ब्र बेगम अख़्तर
    अपनी जादुई आवाज से श्रोताओं के दिलों के तार झंकृत करने वाली यह महान गायिका 30 अक्तूबर 1974 को अहमदाबाद में इस दुनिया को अलविदा कह गई। बेगम अख़्तर की तमन्ना आखिरी समय तक गाते रहने की थी जो पूरी भी हुई। मृत्यु से आठ दिन पहले उन्होंने मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की यह ग़ज़ल रिकार्ड की थी-



    सुना करो मेरी जां, उनसे उनके अफ़साने।
    सब अजनबी हैं यहां, कौन किसको पहचाने॥

    बेगम अख़्तर लखनऊ ठाकुरगंज के पास पसंद बाग़ में अपनी माँ की कब्र के पास दफन हुयी |



     Admin and Founder 
    S.M.Masoom
    Cont:9452060283
    • Blogger Comments
    • Facebook Comments

    0 comments:

    एक टिप्पणी भेजें

    हमारा जौनपुर में आपके सुझाव का स्वागत है | सुझाव दे के अपने वतन जौनपुर को विश्वपटल पे उसका सही स्थान दिलाने में हमारी मदद करें |
    संचालक
    एस एम् मासूम

    Item Reviewed: बेग़म अख्तर एक कभी ना भुलाई जाने वाली आवाज़ | Rating: 5 Reviewed By: M.MAsum Syed
    Scroll to Top