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    गुरुवार, 28 मई 2020

    वीडियो : लीजिये मज़ा उत्तर भारतीय लोकगीत और कजरी का |

    उत्तर भारतीय खासकर पूर्वी लोकगीतों में पूरी पूरी सामजिक व्यवस्था के दर्शन होते है। जब भाई अपनी बहन के घर जाता है, तो बहन अपना दुख बता लेने के बाद भाई से कहती है, 'ये दुख किसी से मत कहना। ये दुख माँ से मत कहना, वह रोएगी,पिताजी से भी न कहना वो भी रोयेंगे। ये सारे दुख अगुआ से कहना, उसी ने ऐसे घर में मेरा ब्याह कराया।'

    ईहो दुख ए भइया अम्मा अगवाँ जनि कहिहा

    मँचिया बइठलि अम्मा रोईहनि हो राम

    ईहो दुख ए भइया बाबा अगवाँ जनि कहिहा

    सभवा बइठल बाबा रोईहनि हो राम

    ईहो दूख ए भइया अगुवा अगवाँ कहिह

    जिनि अगुआ कइलऽ मोर बीयहवा हो राम



    यह गीत श्रीमती विजय लक्ष्मी ने गाया है जोकि डॉ पवन विजय की माँ हैं।




    लिखा है डॉ पवन मिश्र ने और स्वर दिया है डॉ मनोज मिश्र जी ने |


    हमारे गांव में इस समय महिलाये झूले पर बैठ कजरी गा रही होंगी। पेंग मारे जा रहे होंगे। हलकी बारिश में भीगे ज्वान नागपंचमी की तैयारी में अखाड़े में आ जुटे होंगे और मैं यहाँ ७०० किलोमीटर दूर कम्प्यूटर तोड़ रहा हूँ। खैर आप लोग लोकभाषा में लिखे इस गीत और भाव को देखिये।
    +++

    हमका मेला में चलिके घुमावा पिया
    झुलनी गढ़ावा पिया ना।

    अलता टिकुली लगइबे
    मंगिया सेनुर से सजइबे,


    हमरे उँगरी में मुनरी पहिनावा पिया

    मेला में घुमावा पिया ना।

    हँसुली देओ तुम गढ़ाई
    चाहे कितनौ हो महंगाई,

    हमे सोनरा से कंगन देवावा पिया
    हमका सजावा पिया ना।

    बाला सोने के गढ़इबे
    चांदी वाली करधन लइबे,

    छागल माथबेनी हमके बनवावा पिया
    झुमकिउ पहिनावा पिया ना।

    कड़ेदीन की जलेबी
    रसमलाई औ इमरती,

    एटमबम्म तू हमका लियावा पिया
    बरफी खियावा पिया ना।

    गऊरी शंकर धाम जइबे
    अम्बा मईया के जुड़इबे ,

    इही सोम्मार रोट के चढावा पिया
    धरम तू निभावा पिया ना।

    .......डॉ पवन मिश्र



    डॉ ज्योति सिन्हा 

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