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    बुधवार, 25 जुलाई 2018

    पहली बार उठा शाही पुल की गज सिंह मूर्ती के रहस्यमय इतिहास से पर्दा |

    शाही पुल पे स्थित "गज सिंह मूर्ती"  को लोग वर्षों से देख रहे हैं लेकिन इसका सही इतिहास आज भी किसी को नहीं पता बस लोगों के बीच बहुत सी किंवदंतियाँ है जो एक दुसरे से लोग बताया करते हैं | इतिहासकारों ने भी इसके बारे में लिखा जैसे जौनपुर नामा में लिखा गया की यह बौध मंदिर के द्वार पे लगा हुआ था जिसे अपनी विजय का प्रतीक बौध मानते थे | इस बात में सच्चाई की सम्भावना देख जा सकती है |

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    Shardul at Jaunpur
    यह सच है की जौनपुर का इतिहास तुगलग ,शार्की और मुग़ल के पहले बौध से मिलता है जिस पे अधिकतर इतिहासकारों ने पर्दा डाला हुआ है | जौनपुर नामा में भी इतिहासकार ने इस गज सिंह मूर्ती की बनावट और किस युग में इसे बनाया गया होगा इस बात पे ध्यान नहीं दिया या यह कह लें की उनका ध्यान केवल जौनपुर  के इतिहास पे रहा और उसी की नज़र से इसके बारे में लिखा गया |


    इसमें  कोई शक नहीं की यह गज सिंह मूर्ती दसवीं या ग्यारहवीं शताब्दी में या उस से पहले की  बनी है | जिसपे राजपूत युग के  चंदेल राजाओं की छाप है जिन्होंने खजुराहो ,कोणार्क सूर्या मंदिर इत्यादि बनवाये | इन मंदिरों में आपको मंदिर के मुख्य द्वार पे गज सिंह या सिंह के नीचे स्त्री जैसी कलाकृतियाँ और मूर्तियाँ देखने को मिलेंगी |इस दौर में राजपूत वंश ने इन मंदिरों को बनाया और इसी दौर के बने कोणार्क मंदिर में मंदिर के द्वार पे सिंह मूर्ती जो एक हाथी पे सवार है बनी हुयी है | यहाँ यह कहा जा सकता है की इस मूर्ती में शेर (शार्दुल ) गर्व का प्रतिनिधित्व करता है और हाथी पैसे का प्रतिनिधित्व करता है|


    जौनपुर के इतिहास पे नज़र डालें तो उत्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग द्वारा खोज के अनुसार प्राचीन काल में जौनपुर से सटे जनपद प्रतापगढ़ का सराय नाहर हिस्सा 8000 वर्ष पूर्व बसा था | जौनपुर में 500 से 325 BC को बौध काल कहा जाता है जिसमे जौनपुर कौशल नामक महाजनपद के अंतर्गत आता था और यह वो समय था जब जौनपुर में मंदिरों की भरमार ही | एक अनुमान के अनुसार यह गज सिंह मूर्ती किसी बौध मंदिर के मुख्य द्वार पे लगी हुयी थी |

    यह गज सिंह मूर्ती कहा जाता है की किले की खुदाई में मिली थी और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार किले के स्थान पे करार वीरा राछस का किला था और एक मान्यता  के अनुसार कन्नौज के राजा विजयचंद्र का मंदिर भी उसी किले के स्थान पे है | यह वो समय है जब जौनपुर में भरों की आबादी थी जो धीरे धीरे हिन्दुओं  की अन्य जातियों में मिल गए |  यह गज सिंह मूर्ती उस समय की हो सकती है जो इसी किले के  स्थान पे स्थित किसी महल या मंदिर के मुख्य द्वार पे लगी रही होगी |

    दूसरा अनुमान यह है की प्रारम्भिक मध्यकाल में भरो  के पतन के बाद बारहवीं शताब्दी के अंत तक जौनपुर में राजपूत शासन रहा और ये गज सिंह मूर्ती का शेर राजपूत चदेल राजाओं द्वारा निर्मित खजुराहो के शेर से मिलता जुलता है |

    इस काल्पनिक शेर की सच्चाई |

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    Different Shardul at Different Places

    चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित इस काल्पनिक सिंह को हकीकत में "शार्दुल " कहा जाता है जो एक काल्पनिक चित्रण है या आप कह लें की यह शार्दुल उस दौर का पौराणिक पशु है जिसका जिस्म शेर का हुआ करता था और मुख डरावना किसी अन्य काल्पनिक जानवर का होता था |  इस दौर में सबसे अधिक इन शर्दुलों का चित्रण हुआ है | 

    इसी वर्ष मेरा जाना पटना से २५ किलोमीटर दूर एक ऐतिहासिक स्थाल "मनेर " जाना हुआ जहां जो सूफियों का किसी समय  गढ़ रहा था और 1180 इस्स्वी में यहाँ एक छोटी से मस्जिद हजरत मखदूम शेख कमाल उद्दीन मनेरी रहमतुल्लाह अलैह के दादा हजरत इमाम मखदूम मो. ताज फकीह कुरैशी हाशमी ने बनवाई | यहाँ पे महान सूफी शेख याहया (1291 AD) मनेरी की दरगाह है जिसे बड़ी दरगाह कहा जाता है |

    यहाँ इस दरगाह के बाहर एक मैदान में मुझे ठीक वैसी ही गज सिंह मूर्ती दिखी जैसी की जौनपुर में शाही पुल पे स्थित है | दोनों में कोई अंतर नहीं था केवल इतना ही अंतर था की इस सिंह का चेहरा थोडा अधिक डरवाना था और यह मशहूर भी है की जौनपुर के सिंह का चेहरा अंग्रेजों ने बदल दिया था |


    मैंने जब मनेर के इतिहास पे नज़र डाली तो यहाँ भी बौध स्थल होने के सुबूत मिले और राजा कन्नौज गोविन्द चन्द्र और राजा जयचन्द्र का  नाम मिला | आप कह सकते हैं की "मनेर " और जौनपुर के इतिहास में बहुत समानताएं है और वहाँ के लोगों का रहन सहन भी मिलता जुलता है | बौध और रजा कन्नौज ने यहाँ मठ, मंदिर और किले बनवाय थे जैसा की जौनपुर में भी किया गया था | शायद यह गज सिंह मूर्ती उसी में से किसी मुख्या द्वार पे लगी रही हो |

    यहाँ के लोगों से जब इस गज सिंह मूर्ती की जानकारी मांगी तो उन्होंने कहा की इसका नाम " शार्दुल ' है और कुछ लोगों ने इसे " सिंह सादुल " बताया लेकिन इसके इतिहास से अनजान दिखे |
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    Shardul at Maner, Bihar

    इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ऐसा लगता है कि खजुराहो या कोनार्क  मंदिर के गज सिंह की प्रष्टभूमि जौनपुर और मनेर में स्थित गज सिंह से थोड़ी अलग है इसलिए इनके बनाय जाने के समय में अंतर होगा जबकि इन सभी जगहों पे स्थित सिंह वही काल्पनिक जीव शार्दुल है जिसका इस्तेमाल राज्पूर्त राजाओं ने अपने मंदिर के द्वार पे किया लेकिन मुझे ऐसा लगता है की यह शार्दुल की कल्पना उन राजाओं की नहीं बल्कि बौध समाज की दें है जिसका इस्तेमाल बाद के ग्यारहवीं शताब्दी में सबसे अधिक किया गया | 


    जौनपुर और मनेर की गज सिंह मूर्ती "शार्दुल " या सिंह शार्दुल " है  जो बौध समय की देंन है और किसी बौध मठ या मंदिर के मुख्यद्वार की शोभा बनी थी और बौध के काल के जाते जाते खंडहरों में तब्दील हो के किसी टीले में दफन हो गयी थी और खुदाई के दौरान मिली |

    इन दोनों गज सिंह मूर्ती में यह कहा जा सकता है की इस मूर्ती में सिंह शार्दुल गर्व और शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है और हाथी पैसे का प्रतिनिधित्व करता है | मेरा मानना है की यह जौनपुर , मनेर या खजुराहो की मूर्ती जिसमे शेर (शार्दुल) और हाथी या  स्त्री आपसी प्रेम और दो सभ्यताओं के आपसी मिलन और प्रेम को दर्शाता है | आप यह भी कह सकते हैं की जौनपुर और मनेर के शार्दुल और हाथी की मूर्ती शक्ति और धन के मिलन से विजय के प्रतीक हैं क्यूँ की इन मूर्तियों में शार्दुल हाथी की हिफाज़त करता अधिक नज़र आता है |

    आज इस बात की आवश्यकता है की इस गज सिंह या शार्दुल के पथ्थरों की जांच की जाय की ये किस युग का है तो जौनपुर उस इतिहास पे से पर्दा उठा सकता है जो आज किसी को याद भी नहीं है | प्राचीन जौनपुर के इतिहास में इसका  नाम अयोध्यपुरम था या थामोनियुम ऐसे सवालों से पर्दा उठा सकता है और शायद ऐसी गज सिंह मूर्तियाँ और भी किले के खंडहरों से मिल जाएँ |

    लेखक एस एम् मासूम 


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