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    शनिवार, 29 सितंबर 2018

    जफराबाद जिस शहर में छुपे हैं अनगिनत रहस्य |

    जफराबाद जिस शहर में छुपे हैं अनगिनत रहस्य |  लेखक एस एम् मासूम 

    जफराबाद जैसे प्राचीन शहर को क़रीब से देखने का अवसर मिले तो पूछना ही  क्या है । जौनपुर से मोटर साइकिल  से जफराबाद जाना अधिक सुविधाजनक रहता है यदि आपका इरादा वहाँ के प्राचीन इमारतों और स्थानो को देखने का ही हो तो । आज भी इस शहर में खुदाई करने पे नीचे एक पूरे शहर के बसे  होने के निशानात मिलतेहैं | राजा जयचंद के आने के समय यह एक टूटा फूटा   बौद्ध स्थलों का खंडहर था | 

    कन्नौज के राजाओं की राजधानी रहा जफराबाद का पुराना नाम मनहेच भी है ।  मनहेच संस्कृत का शब्द है और  इसका  का मतलब होता है ऐसा भू भाग  जहां से विद्या के स्त्रोत प्रस्फुटित होते है ।  इसी कारण 1321 से पूर्व तक ज़फराबाद को "विद्याभूमि "के नाम से ख्याति प्राप्त थी। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के सुपुत्र से पहले ज़फराबाद बौद्ध धर्म और जैन धर्म की आस्था का मुख्य केंद्र होने के अलावा कन्नौज के राजाओं, राजा जयचंद और उदयपाल की सत्ता का केंद्र उसकी राजधानी हुआ करता था। ज़फराबाद पौराणिकता के ऐतबार से पुरुषोत्तम रामचंद्र जी, परशुराम ऋषि और यमदग्नि, ऋषियों की कर्मस्थली और तपोभूमि थी जिसे आज ज़फराबाद से 2 किमी दूर उत्तरपश्चिम में जमैथा नाम के गांव में स्थित है| इसी जमैथा में रामचद्र जी का आगमन दो बार हुआ जिसे आज लोगों ने भुला दिया | 



    जब यहां पे गयासुद्दीन तुगलक के पुत्र जफरशाह का अधिकार हो गया तो उसने इसका नाम जफराबाद रखा और इसे नए सिरे से आबाद करवाया ।  इतिहासकारो के अनुसार जफराबाद ७२१ हिजरी या १३२१ इ में आबाद हुआ ।  जफराबाद बहुत ही प्राचीन बस्ती है और यह जौनपुर शहर से ४-५ मील की दूरी पे स्थित है ।

    आज जफराबाद उजड़ा हुआ लगता है जहां चारो ओर महलो के खंडहर और मक़बरे बने हुए है । किसी शायर ने भी क्या खूब कहा है की


    उगे हैं सब्ज़े वहाँ जे जगह थी नर्गिस की 
    खबर नहीं की इसे खा गयी नज़र किसकी

    जफराबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन के बाहर जैसे ही आप आएंगे आपको शाहज़ादा ज़फर की बनवाई हुयी ईदगाह और उसी के पास सय्यद मुर्तज़ा का मक़बरा , मिलेगा और जब आप सीधे आबादी की तरफ जाने में शहज़ादा ज़फर की बनवाए जाम मस्जिद मिलेगी और उसी के बाए तरफ मुल्ला बहराम की बारादरी है ।  गोमती नदी के किनारे जाने में आपको मखदूम चिराग़ ए हिन्द का रौज़ा मिलेगा जहां आस पास उनके बहुत से शिष्यों की समाधियाँ भी मजूद है । 

    नदी के किनारे असंख्य पक्की मज़ारें दिखाई देती है, जिन्हें  वक़्त ने   महज़ निशाँ में तब्दील कर डाला है। इतिहास गवाह है कि यह क़ब्रें क़ुतुबुद्दीन ऐबक और राजा जयचंद और राजा विजयचंद के बीच हिंसक युद्ध मे मारे गए शहीदों की हैं। शहर के मध्य के दक्षिणपश्चिम और उत्तर पूर्वी छोर पर अरब से आये धर्मोपदेशक सय्यदों की हैं जिन्होंने ने धर्म प्रसार के लिए ज़फराबाद को अपना ठिकाना बनाया। शेख सदरुद्दीन जो चिराग़ ए हिन्द के नाम से मशहूर है जिनके पश्चिम में आसनी कोट है, जिले जयचंद का किला कहते है वहीं पर शाहबुद्दीन गौरी और क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने किले पर हमला किया था। यह कोट या किला आज भी अपने अंदर न जाने कितने राज़ छुपाए हुए है।  
    शहर के मध्य में एक जामा मस्जिद ज़फ़र शाह तुग़लक़ ने बनवाई है जिसके बारे में कहते हैं कि इस आर्किटेक्ट की दूसरी मस्जिद मुल्तान में है। इसकी विशेषता यह है कि 20 फ़ीट ऊंची इस मस्जिद में 84 खंबे हैं। बाद में शेख  बडन  जो शाह कबीर के शिष्य थे उन्होंने इस मस्जिद  की पूरी तरह से मरम्मत करवाई और तब से  नाम शेख  बडन  की मस्जिद पड़ गया । इस  मस्जिद का निर्माण ७२१ हिजरी या १३२१ इ में हुआ । 

    कोट आसनी से उत्तर पश्चिम में स्थित मक़बरा शेख सदरुद्दीन चिराग़ ऐ हिन्द  बहुत ही मशहूर है और इसके आँगन में हज़रत मक़दूम के घराने वालो की समाधियाँ है ।  इन समाधीयों में  शहज़ादा ज़फर तुग़लक़ की भी  है जिसके सिरहाने संग  मूसा का एक पध्धर लगा हुआ है । 

    यहां अंदर जाने पे एक मस्जिद है जहां बकरा ईद  के दिन नमाज़ ऐ सालतुततारीफ  पढ़ाई जाती है और यह नमाज़ पूरे भारतवर्ष में और कहीं नहीं पढ़ाई जाती । 



    रौज़ा मक़दूम आफताब ऐ हिन्द आपका रौज़ा मस्जिद, खानकाह ,लंगर खाना तथा निकास स्थान  सय्येदवाड़ा में गोमती किनारे स्थित है । इसी से सत्ता हुयी एक मस्जिद है जहां  शेख सदरुद्दीन चिराग़ ऐ हिन्द  इबादत किया करते थे । यहां  उनके खानदान वालों की और बहुत से समाधियाँ भी है ।



    रौज़ा मखदूम मुल्ला कयामुद्दीन गोमती नदी के किनारे मोहल्ला  अहद में स्थित है और उसी रौज़े के अंदर  आपकी पत्नी की समाधी भी है । इस रौसे में एक मस्जिद और एक इमामबाड़ा है जिसमे मुहर्रम और चेहल्लुम में ताज़िया दफन किया जाता है । 

    काग़ज़ियाना मुहल्ला जामा मस्जिद के उत्तर में एक काग़ज़ के कारख़ाने के अवशेष आज भी हैं जिसका ऐतिहासिक विवरण मिलता है कि विश्व के श्रेष्ठतम काग़ज़ का निर्माण हुआ करता था

    मक़बरा सय्यद मुर्तज़ा जफराबाद के मोहल्ला रसूलाबाद में स्थित है । यह वही  पे कुतुब्बुद्दीन ऐबक और उदयपाल का युद्ध हुआ था और इसे सहन ऐ शहीद के नाम से भी जाना जाता है क्यों की यहां पे इस जंग में जो शहीद हुए उनकी क़ब्रें है ।

    मक़बरा ज़फर शाह तुग़लक़ जिसने जाफराबाद बसाया 





     अंत में इस पूरी टीम का धन्यवाद

    आज इस सय्यदों और सूफियों के शहर में इनकी आबादी खत्म हो चुकी है सिर्फ दो घराने सय्यदों के बचे हैं | 

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