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    सोमवार, 7 मार्च 2011

    अंदाज़ अपना - अपना



    क्यु हरदम टूट जाने की बात करती हो |
    नारी हो इसलिए बेचारगी की बात करती हो |
    क्या नारी का अपना कोई आस्तिव नहीं ?
    एसा कह कर खुद को नीचे गिराने की बात करती हो |
    खुद को खुद ही कमजोर बना , ओरों पर क्यु 
    इल्ज़ाम  लगाने जैसी बात कहती हो ?
    खुद को परखने की हिम्मत तो करो |
    कोंन कहता ही की तुम ओरों से कम हो ?
    एसे तो खुद ही खुद को कमजोर 
    बनाने की बात कहती हो |
    नारी की हिम्मत तो कभी कमजोर थी ही नहीं |
    ये तो  इतिहास के पन्नों में सीता , अहिल्ल्या 
    सती सावित्री  की  जुबानी में  भी  है |
    फिर क्यु घबरा कर कदम रोक लेती हो ?
    अपनी हिम्मत को ओरों से कम क्यु 
    समझती हो |
    अपना सम्मान चाहती हो तो पीछे हरगिज़ 
    न तू हटना |
    पर किसी को दबाकर उपर उठाना एसा भी 
    तू हरगिज  न करना |
    इस सारी सृष्टि में सबका अपना बराबर 
    का हक है |
    खुद के हक को पाने के लिए किसी को भी 
    तिरस्कृत तू हरगिज़ न करना |
    ये नारी तू प्यार की देवी है |
    इस नाम को भी कलंकित तू 
    कभी न करना |
    प्यार से अपने हिस्से की गुहार
    तू हर दम करना |
    अपने साथ जोड़ना ... किसी को 
    तोड़कर आगे कभी मत बढ़ना |
    साथ लेकर चलने का नाम ही समर्पण है |
    नारी के इसी प्यार पर टिका सृष्टि 
    का ये नियम भी है |
    इसको बचा कर रखना इसमें तेरा , 
    मेरा और सबका  हित भी है |   
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    एस एम् मासूम

    Item Reviewed: अंदाज़ अपना - अपना Rating: 5 Reviewed By: Minakshi Pant
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