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    शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

    लाल दरवाज़े से जुडी कुछ सच्चाइयाँ जो बहुत कम लोग जानते हैं |

    लाल दरवाज़ा के नाम से मशहूर मस्जिद जो बेगम गंज के इलाके में पड़ती है और मल्हनी पड़ाव की तरफ आते जाते लोग उसे हर दिन देखते हैं लेकिन यह बहुत कम लोगों को इसके बारे में जानकारी है | आज आपने सामने है इतिहास की परतों से निकालते गए ऐसे सत्य जो इस लाल दरवाज़े की मस्जिद को नेई पहचान दे सकते हैं |

    लाल दरवाज़ा के नाम से जो मस्जिद आज जानी जाती है यह हकीकत में इसका नाम नहीं बल्कि इसके पास बीबी राजे का एक महल था जिसका दरवाज़ा लाल याकूत पथ्थर का बना था और वो दरवाज़ा पूरे शार्की राज्य में मशहूर था | उसी लाल दरवाज़े के नाम से इसे लोग पहचानने लगे जबकि लाल दरवाज़ा और यह मदरसा और मस्जिद शार्की क्वीन बीबी राजे का बनवाया हुआ है |
    इस मस्जिद का अस्ल नाम मस्जिद सिपाहगाह है |

    लाल दरवाज़े के पास एक मुहल्लाह सिपाह गाह है जिसे बीबी राजे ने बसाया था और वहाँ पे एक विहार महल और महिलाओ का कॉलेज १४४१ में बनवाया और उसके बाद यह लाल दरवाज़ा मस्जिद बनवाई | वो मदरसा तो आज मौजूद नहीं लेकिन लाल दरवाज़े के नाम पे मशहूर उसी मस्जिद में एक मदरसा है जो उसी मदरसा ऐ हुसैनिया के नाम से चलता है | इस लाल दरवाज़े मस्जिद के तीन गेट हैं जिसमे से पूर्व वाला गेट सबसे बड़ा है |


    शाही भवनो में लाल दरवाज़ा नामक भवन बहुत अधिक प्रसिद्ध था जिसका केंद्रीय द्वार प्रशस्त तथा बहुत ही ऊंचा था । इसमें लगे हुए फाटक को एक व्यक्ति खोल भी नहीं सकता था । लाल दरवाज़ा भवन में ऐसे बहुमूल्य और अनुपम लाल रंग के पत्थर जोड़े गए थे जो रात्रि में हलकी सी भी रौशनी पाते ही जगमगा उठते थे । यही कारण था इसका नाम इसका नाम लाल दरवाज़ा प्रसिद्ध हो गया । इसके दरवाज़े पे क़ुरआन की आयतें लिखी हुयी थी । इसे भी इब्राहिम लोधी ने पूरा तोड़ दिया ।

    शार्की समय में जौनपुर में १४०० से अधिक ज्ञानी , संत और सूफी का आगमन हुआ जिनमे से एक थे सय्यद अली दाऊद जिनकी शान में शार्की क्वीन बीबी राजे ने अपने लाल दरवाज़ा महल के पास ही यह मस्जिद सिपाहगाह और मदरसा हुसैनिया बनवाया जो विश्व प्रसिद्ध मदरसा था | सय्यद अली दाऊद का पुराना घर सिपाहगाह में था जिसके निशाँ आज भी मौजूद है और उनकी कब्र सदल्ली पुर इलाके में मौजूद है | सय्यद अली दाऊद के घराने वाले आज भी पानदरीबा में रहते हैं |


     
    जौनपुर में शर्क़ी समय या मुग़ल समय की इमारतों में इस कला की सुंदरता आज भी देखने को मिल जाय करती है ।लाल दरवाज़ा भी अपनी सुलेख कला के लिए मशहूर था जो अब नहीं बचा लेकिन लाल दरवाज़ा मस्जिद में मेम्बर के पास आज भी आपको सुलेख कला के नमूने मिल जायेंगे |



    इस सुलेख कला का श्रेय कजगाँव के मौलाना गुलशन अली जो दीवान काशी नरेश भी थे और राजा इदारत जहाँ को जाता है |






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