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    शनिवार, 31 जुलाई 2021

    बनारस हो मुंबई हो कानपुर या जौनपुर पान की शान क़ायम है ।

    मुअज़िज़ दोस्तों आदाब अर्ज़ है उम्मीद करता हूं कि आप सब खै़रियत से होंगे।

     आप सबकी जानिब मेरी आज की ये पोस्ट मैं उन सभी लोगों की नज़र करता हूं जो पान खाने का सिर्फ़ शौक ही नहीं रखते हैं बल्कि इसे दिन में कई मर्तबा खाना उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा है।

    बस यूं समझ लीजिए कि जिस दिन इन्हें किसी वजह से पान ना मिले तो उस दिन को मनहूस मान लिया जाता है।

    *नदारद है सुर्ख़ी पान की उनके लबों पे आज*
    *ऐसा ना हो के मेरे क़त्ल का वो
    *बीड़ा उठाए हो*

    *साहिल*🌹


    इसके ज़रिए मैं हिंदुस्तान भर के तमाम उन पांन फ़रोशों को भी अपना सलाम पेश करता हूं जो कि अपनी कई पुश्तों से इस काम को बख़ूबी करते आ रहे हैं... उनके पांन लगाने और खिलाने के मुख़्तलिफ अंदाज़ जो कि उन इलाकों में ही नहीं जहां इनकी दुकानें है बल्कि पूरे शहर भर में मशहूर हैं।🌹

    किसी मनचले शायर ने भी क्या खूब कहा है

    *उनके लबों का बोसा पांन ले और मैं खड़ा देखा करूं*
    *या ख़ुदाया क्या इस पत्ते से बदतर मेरी तकदीर है*

    वैसे तो आमतौर पर रोज़मर्रा खाए जाने वाले रसीले पान के बारे में ना जाने कितने ही शायरों ने क्या-क्या न लिखा है और तो और इसकी शान में कई दीवानें तरह-तरह के कसीदे पढ़ते आपको अक्सर पुरानें ल़ख़नऊ की पेंचीदा गलियों में मिल जाएंगे....  ना जाने कितने ही गीत इसकी ख़ुसूसियत और सुर्ख़ लाली के बारे में अक्सर ही राह चलते आपको किसी रेडियो पर आज भी बजते सुनाई पड़ेंगे.... पान खाए सैंया हमारो सांवली सूरतिया होंठ लाल लाल,, हाय हाय मलमल का कुर्ता और मलमल के कुर्ते पे छींट लाल लाल.... लेकिन कहते हैं ना शान और बान दोनों का चोली और दामन का साथ है... इसलिए बात अगरचे पान की हो तो फिर.... पानदान का ज़िक्र क्यों पीछे रह जाए।

    *क़ाबिल ए एहतराम हैं ये तख़त पर धरे हुये*
    *पांनदान का रूतबा है बुज़ुर्गों सा घरों में।*

    *साहिल*🌹

     प्राचीन संस्कृति और विरासत की धरोहर शहर ए ल़ख़नऊ और उसके असल बाशिंदों को तरह-तरह के पान और इनके पत्तों की वाकई बेहतरीन समझ है.. देशावरी, कपूरी,सांची, मीठी पत्ती, कलकत्तिया,,मघई, देसी बांग्ला, महोबिया, सौंफिया,सफेदा बनारसी आदि और भी ना जाने बदलते हुए वक़्त के साथ कितनी ही देसी विदेशी पान के पत्तों की क़िस्में.. समय-समय पर हमारे सामने आती रहती हैं... लेकिन साहब मानना पड़ेगा पुराने ल़ख़नऊ के ख़ास ओ आम बड़े बड़े कीमियाई बुज़ुर्गों के साथ ही साथ इस शहर के नौजवान भी इसका पत्ता दूर से ही देख कर बता देते हैं कि दरअसल इसकी ज़ात क़िस्म और ज़ायक़ा क्या है...
    इन दीवानों के लिए एक शेर पेश ए ख़िदमत है।

    *कुर्ते पे ना पड़ी छींटें जिसके स़ुर्ख़ पान की*
    *ल़ख़नऊ में उसे पान का शैदाई नहीं कहते*

    *साहिल*🌹

    जनांब ए आली शहर ए ल़ख़नऊ का शायद ही कोई ऐसा घरानां होगा जिनके यहां पानदान ना हो.... इनका घरों में होनां शान ओ शौकत और खुशक़िस्मती का बायस माना जाता है

    पुराने ल़ख़नऊ के कई रिहायशी लोगों से हमने सुना है कि पुराने व़क्त में हैसियत के मुताबिक़ लोगों के घरों में पानदान हुआ करते थे।

     नवाबीन ए अवध के बहुत से रईस ख़ानदानों में आज भी सोने और चांदी के बहुमूल्य रत्न जड़ित पानदान मौजूद हैं गए ग़ुज़रे और किसी के बिगड़े हालात ए व़क्त के साथ न जाने कितने ही बेशक़ीमती पानदान राजा बाज़ार के लाला महाजनों की चौखट पर बेबसी के चंद सिक्कों के बदले दम तोड़ चुके हैं।

     आज भी पुरानें यहिया गंज में बर्तनों के बाज़ार में तरह-तरह के नए पुराने तांबे पीतल के कलई दार और बेहतरीन नक़्क़ाशी से सजे हुए तरह-तरह के छोटे बड़े और लगभग हर क़िस्म के ये नांयाब नमूनें ख़ुद की बिक्री के लिए अपने क़द्र दानों की राह देखते रहते हैं।

    संस्कृत में इस हरे पत्ते को तांबूल कहा जाता है चरक संहिता में इसके बेहतरीन औषधीय गुणों का ज़िक्र हिंदुस्तान के वैद्य और हक़ीमों नें बड़ी ही ख़ूबीयों के साथ किया है...

     विश्व प्रसिद्ध प्राचीन ग्रंथ वृहद कामसूत्रम में महर्षि वात्स्यायन के द्वारा वर्णित कुछ पंक्तियां यहां प्रस्तुत है .. बाजी कारक और कामोत्तेजक प्राकृतिक औषधियों के अध्याय में वो कहते हैं के,,, तांबूल्य: तमोगुणीमस्य: कामोद्दीपकम:,,, यानी इसके सेवन से काम संबंधी स्तंभन शक्ति को प्राप्त किया जा सकता है ... पान खाकर कामातुर प्रेमासक्त नायक मधुर रति की कामना हेतु विभिन्न प्राकृतिक सुगंधित एंव कामोत्तेजक पदार्थों को तांबूल में डालकर अपनी नायिका को रिझाते हुये अनुनय: पान खा लेने की मनुहार करता है... ताकि नायिका भी उन्मुक्त और कामोत्सक्त होकर सहवास के चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर सके,, इस पेशक़श और इसके सौंदर्य पूर्ण कलात्मक पक्ष को भी इस महा ग्रंथ में पढ़ा जा सकता है..

     हक़ीम ल़ुक़मान के अनुसार दिल और जिगर की तमाम बीमारियों में ये बड़ा ही मुफ़ीद पाया गया है,, उन्होंने भी कूवत ए बाह के लिए इसके कुछ ख़ास नुस्ख़ों की तजवीज़ की है

     औषधीय गुणों से परिपूर्ण ये पत्ता प्राचीन भारत के लगभग हर प्रांत के जन सामान्य के साथ ही साथ राजा महाराजा, नवाब और रईस सामंतों के दरबार की आंन बान और शान होता था... दरबारों में शामिल होने वाले बड़े-बड़े गुणीजन कवि साहित्यकार और माहिर ए इल्म फ़नकार अपने दिल में ये हसरत रखते थे कि काश उन्हें राजा महाराजा और नवाब साहब के मुबारक हाथों से पान खानें का शरफ़ हांसिल हो.... क्योंकि उन दिनों ये बड़ी इज़्ज़त ओ आफ़ज़ाई की बात मानी जाती थी....

    हमारे शहर ल़ख़नऊ में आज भी ये रिवाज़ क़ायम है के किसी भी छोटी बड़ी दावत में आए हुए मेहमानों को खाने के बाद पान ज़रूरी तौर पर खिलाया जाता है.... लेकिन इसे ना खिलाया जाना बड़ी ही बे अदबी की बात मानी जाती है
    अब लीजिए हुजूर इस बात पर भी एक शेर अर्ज़ किया है।

    *वैसे तो बिछ गई थीं वहां लज़्ज़तें तमाम*
    *खिला देते गर वो पान तो कुछ और बात होती*

    *साहिल*🌹

    सनातन धर्म के अनुसार किसी भी पूजा पर्व वैदिक अनुष्ठान या फिर वैवाहिक शुभ अवसरों पर बिना इसके पत्ते और सुपारी के किसी भी कार्य का शुभारंभ नहीं होता है.. तांबूल का होना आवश्यक ही नहीं बेहद महत्वपूर्ण भी है।

    मुस्लिम धर्म के अनुयाई भी अपने पवित्र कार्यों में इन पत्तों का इस्तेमाल बख़ूबी से करते हैं
    शादी ब्याह सहित घर आए हुए अज़ीज़ ओ अज़ीम मेहमानों की रुख़सती के व़क्त चांदी की कुलियों में सोने और चांदी के वरक़ लगे हुये पानों को पेश करने की बड़ी ख़ास और पुरानी रिवायत रही है,,, किसी  मक़सद से बाहर या फिर सफ़र पर जाने वाले हर शख़्स को पान खिलाने के बाद ही घर से विदा करने की हमारे ल़ख़नऊ की ये एक पुरातन परंपरा रही है जो कि आज भी क़ायम है।

     दिल की शक्ल का ये सब्ज़ पत्ता जो हमारे और आपके लबों की ख़ुशबू बन कर आज भी अपनी सुर्ख़ी पर इतराया करता है,,  तो फिर आइए अब इसकी तिजारत करने वाले कुछ पान फ़रोशों के दिलचस्प अंदाज़ और उनके नफ़ासत भरे सलीक़े पेश ए ख़िदमत हैं।

    दोस्तों जैसा कि मैंने अपने पिछले कई आर्टिकल्स में ल़ख़नऊ की गंगा जमुनी तहज़ीब और तमद्दुन का हमेशा बढ़-चढ़कर ज़िक्र किया है... जिसमें मैंने हर दफ़ा कहा है कि इस मारूफ़ शहर में हिंदू और मुस्लिम हज़रात दोनों ही तबक़ो के लोग सदियों से प्यार मुहब्बत के पाक़ीज़ा रिश्तो के रंग में घुल मिल कर रहते आए हैं... सब के सुख दुख के एहसासों की रेशमी डोर एक दूसरे से बंधी हुई है.....तीज त्योहार उठना बैठना, खाना-पीना, ख़रीद-फरोख्त़ सब कुछ हम एक दूसरे के साथ मिलकर ही करते हैं... कहीं कोई किसी भी तरह का फ़र्क नज़र नहीं आता है....

    ल़ख़नऊ के अक़बरी गेट वाली ढलान के दूसरे चौराहे पर बांई तरफ चौड़ी सी इक गली जो कि क़श्मीरी महल्ले और मंसूर नगर को आपस में जोड़ती है उसके ठीक सदर मुहानें पर एक पान की बहुत पुरानी और मशहूर दुकान है, जिसे चलाते हैं हरदिल अज़ीज़ जनांब हारून साहब.... बड़ी ही अज़ीम ओ ख़ास शख्स़ियत के मालिक हैं ये... सारी दुनियां में उनके चाहने वाले मुरीद इन्हें हारुन भाई के नाम से जानते हैं.... आम क़द काठी के बेहद ख़ुश मिजाज़ मेहमान नवाज़ और नरम दिल इंसान
    *जनाब हारून साहब* 
    माशाल्लाह आप बेहद नफ़ासत भरे दिलचस्प किस्म के इंसान हैं,, पुराने लखनऊ का शायद ही कोई ऐसा बाशिंदा होगा जो उन्हें और उनके पांन लगाने के बेहतरीन अंदाज़ को ना जानता हो....

     बस एक दफ़ा आप उनसे मिल भर लीजिए...बस्स आप भी इनके तमाम दीवानों की तरह हमेशा के लिये इनके मुरीद हो जाएंगे।

    तो आइए जनांब आपको इनकी दुकान के कुछ बेहतरीन नज़ारों से वाक़िफ़ करवाते हैं.... सुबह तकरीबन आठ बजे के आसपास दुकान खुल जाती है जहां पर ये अपने दो शागिर्दों के साथ तशरीफ ले आते हैं,,, दुकान खुलने के साथ ही साफ सफाई का काम शुरू हो जाता है,धूपबत्ती करने के बाद ही वो अपनी गद्दी संभालते हैं ,,बड़े ही करीने से भीगे हुए कत्थे और चूने के साथ ही साथ हरे और ताज़े पानों के मुख़्तलिफ़ पत्तों को उनके आकार के हिसाब से सजानें संवांरनें में लग जाते हैं... इस व़क्त इनकी बिजली जैसी चुस्ती फ़ुर्ती बस देखने वाली होती है,,, इसकी ख़ास वजह ये है कि सुबह अपने कारोबारी और दफ़्तरों को जाने वाले तमाम गहकों के लिए इन्हें उनके आने से पहले ही पान की गिलौरियां लगाकर रखनी होती है, ताकि उन्हें इंतज़ार न करना पड़े.. आख़िर सब को ऐंन व़क्त पर अपने काम पर पहुंचना भी ज़रूरी है न... इस बात को हारुन भाई से बेहतर भला और कौन समझ सकता है.. तयशुदा व़क्त पर लोग आते हैं और पूरे दिन के हिसाब से अपनी अपनी पुड़िया ले जाते हैं... कौन कैसा पत्ता खाता है उसमें क्या-क्या डालना है ये इनकी करामाती उंगलियों को बख़ूबी याद रहता है।

    ‌सुबह 9:00 बजे से लेकर 11:00 बजे का व़क्त बेहद मसरूफ़ियत भरा रहता है.. हज़ारों की तादात में लगे हुए ये महकते पत्ते अपनी मंज़िल ए मक़सूद तक पहुंच चुके होते हैं... टिक टिक की धीमी आवाज़ के साथ घड़ी की सूइयां मुसलसल अपनी रफ्तार को दोपहर 12:00 बजे की गिनती तक पहुंचाने में लगी हुई हैं और इधर व़क्त हो चला है थोड़ी सी फ़ुरसत का.... . और ये लीजिए हुजूर अब इनके कुछ चाहने वाले रोज़मर्रा के फ़ुरसतिये और दिनभर की सप्तारी काटनें वाले यार दोस्त इनकी दुकान को चारों तरफ से घेर कर आ खड़े होते हैं... रोज़ की तरह गर्मजोशी के साथ उनसे सलाम दुआ होती है... ख़ैर सल्ला पूंछने के साथ ही साथ चाय नाश्ते की पेशक़श भी,,क्योंकि सड़क के उस पार मौलाना मिठाई वाले की मशहूर दुकान भी तब तक अपने उरूज पर होती है... अमां मियाँ उनके गरमा गरम गुलाब जामुन बेसनी पतीसा समोसे और नमक पारों का भला क्या कहना...ज़ायक़ा ऐसा जो सर चढ़कर बोले और उसपर सोनें पे सुहागा नुक्कड़ के चाय वाले की बेहतरीन इलायची अदरक़ की महक से गमकती हुई बालाई वाली इसपिसल दूधिया चाय....वाह्ह... जनांब यकीन मानिए मूंछें तर हो जाती हैं..सबकी... बाद इसके पान और सिगरेट तो फिर लाज़मी है ही...
    ‌ 
    ‌रोज़ हर दिन की तरह इस मुसलसल और मोहब्बती घाटे के साथ ही साथ चाय नाश्ते के बिल की पर्ची तो हमेशा हारुन भाई की जेब से ही कटती है।

    अमां बस यूं समझ लीजिए कि दोपहर होते-होते ये दुकान एक से बढ़कर एक बेशक़ीमती और कीमियाई नमूनों की आमद का क़दीमी मरकज़ बन जाती है.... बड़े ही ज़हीन क़िस्म के ख़ानदानी अदबी शुर्फ़ा लोगों के साथ ही साथ आसपास के कुछ बेहतरीन तारीख़ी लफ्फाज़ भी यहां इकट्ठे होते हैं... जिनकी जादुई और तिलिस्माती क़िस्सागोई के रम्माली जाल में आप बस यूं उलझ के रह जाएंगे के इंच भर भी वहां से हिलने की हिमाकत न कर पाऐंगे.... कहे अनकहे न जाने कितने दफीनें,अकूत ख़जानों के क़िस्से, करिश्माई परियों और जिन्नातों की हैरत अंगेज़ दास्तानें दिल थाम कर परत दर परत बस आप सुनते ही जाएंगे.....

    दोपहर की धूप कब शाम का सुर्ख़ आंचल ओढ़ कर आ जाएगी... आपको पता ही नहीं चलेगा।

    इनके काउंटर के बाएं कोनें को मैंने अक्सर दस्तरख्व़ान में तब्दील होते हुए भी देखा है... अब क़िस्से कहानियों का दौर जब लंबा चलेगा तो जाहिर सी बात है कुछ लोगों को शिद्दत की भूख भी परेशान करती ही होगी.... तो लीजिए जनांब.. नोश फरमाइए बस अर्ज़ करने भर की ज़रूरत है..कि मुबीन की बिरयानी.. रहीम के कुल्चे निहारी, टुंडे के कवाब पराठे मौलाना स्वीट्स की दूधिया लौज,काली गाजर का हल्वा और भी ना जाने यहां क्या-क्या हाज़िर हो जाए ये आप कह नहीं सकते हैं।

    एक मुस्कुराहट के साथ हारुन भाई इस खुशगवार माहौल का मज़ा लेते हुए बीच-बीच में आते जाते अपने ग्राहकों की बड़ी ही इज्ज़त अफ़जाई के साथ ख़िदमत भी करते रहते हैं... अपने तिजारती फर्ज़ को अंजाम देते हुए वो आपको किसी भी तरह की शिकायत का कोई मौक़ा न देंगे।

    शाम का व़क्त हो चला है.. पास की पुरानी मस्जिद से मग़रिब की अज़ान के पाकीज़गी से भरे मधुर स्वर के साथ ही इनकी दुकान से बेला मोगरे की अगरबत्ती, महंगे ऊद और लोबान का उठता महकता धुआं आसपास के माहौल में इंतहाई रूहानियत का अहसास कराने लगता है...रोज़ की तरह दुकान की पिछली दीवार पर बने हुए एक पुराने ताख़ में ताज़े सुर्ख़ गुलाब के फूल चढ़ाने के बाद शाम से लेकर रात तक लगने वाले पानों की कटाई छटाई का काम शुरू हो जाता है। 

    सोने के मानिंद पीतल के चमकते हुए प्यालों में देसी चूना और घुटा हुआ मख़नी कत्था फिर से भर दिया जाता है.... तरह-तरह की सूखी गीली चिप्स, निर्मली चिकनी खुशबू से तर सुपारियां...  मीठे क़तरे और शमामां जैसे क़ीमती इत्र मे गमकती हुई बेहतरीन तंबाकू और कई क़िस्म के महंगे खुशबूदार ज़ाफ़रानी क़िमाम...गुलाब गुलकंद, सोने और चांदी के वरक़ में लिपटी हुई शाही गोलियां,और रंगीन ख़ुशबूदार चटनियों के डिब्बे काउंटर पर सजा दिए जाते हैं 

    धीरे-धीरे दुकान पर भीड़ बढ़ती जाती है और इन सबके बीच ही बज़्म ए सुख़न की शमां रौशन हो उठती है... कुछ एक अच्छे सुख़नवर अपना या फिर किसी दूसरे मक़बूल शायरों का क़लाम मौजूद कद्रदांनों की वाहवाही और मिलती हुई दाद के साथ पढ़ रहे हैं...अमां जनांब वाह वाह क्या कहनें...अहा उम्दा बहुत खूब की एक ही साथ कई आवाज़े आते जाते राहगीरों को भी बरबस अपनी ओर खींच लेती हैं... और तभी जनांब हारुन साहब चाय वाले छोटू को आवाज़ देकर कहते हैं के तीन की पांच मीठी,, और दो की तीन एकदम फ़ीक़ी... और हां दस के नमक पारे भी लि आइये... दौड़ कर जाइए औ लपक के आइये... फिर गर्म चाय की चुस्कियों और मौजूद शायरों के अशआरों के साथ ही साथ रात जवान होने लगती है... शहर के तमाम नामी गिरामी साहित्यकार, शायर, वकील, थियेटर आर्टिस्ट, इंजीनियर, सर्राफा दुकनदार और ऊंचे सरकारी ओहदों पर याफ्ता अफ़सरों के साथ ही साथ बहुत से ख़ास ओ आम मामूली लोग भी यहां एक ही नज़र से देखे जाते हैं.... कहीं कोई भी भेदभाव नहीं... इस मंज़र पर जनांब अल्लामा इक़बाल साहब का एक शेर याद आ गया कि....

     *एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़* 
    *ना कोई बंदा रहा ना कोई बंदा नवाज़।*

    रात 1:00 बजे तक ये महफिल अपने उरूज पर होती है... और फिर रात 2:00 बजे दुकान बंद होनें तक हारुन भाई अपने सभी कद्रदांनों को पान खिलाने में मसरूफ़ रहते हैं।

    मई-जून की तपती दोपहर में इनकी दुकान में बाहर की अपेक्षा गर्मी से कुछ राहत रहती है,, आपको मिट्टी के घड़े का असल ख़स के इत्र की खुशबू से महकता हुआ ठंडा पानी भी पीने को मिलेगा... एक छोटा सा कूलर आने जाने वाले ग्राहकों को अपनी शीतल हवा से तर करता रहता है... इन दिनों बर्फ की पक्की सिल्ली पर करीने से बिछाय हुए पांन के ठंडे और बर्फीले पत्ते खानें से आपकी रूह और जिस्म को क़श्मीर की वादियों में होने का एहसास होगा.. 

    कभी क़दार हो सकता है कि आपको यहां लस्सी, रूह अफज़ा शरबत या फिर कोल्ड ड्रिंक भी पेश की जाए.... आप लाख नां नुकुर करते रहें लेकिन बड़े ही ख़ुलूस ओ मुहब्बत और इसरार के साथ आपके हाथों में एक गिलास थमा ही दिया जाएगा... भले ही क्यों ना आप पहली ही दफ़ा इनकी दुकान पर आए हो... और मुरव्व़तन आप अपनी जेब से पैसे निकाले इससे पहले ही वहां खड़े अदीबों में से कोई ना कोई इसका पैसा पहले ही अदा कर चुका होता है.... आप इनका शुक्रिया भी अदा करना चाहें तो ये बड़े प्यार से कहते हैं कि जनांब ए आली आप हमारे यहां पहली बार आए हैं.. आप हमारे मेहमान हैं जब अगली दफ़ा तशरीफ लाइयेगा तो आप ही सबको पिला दीजिएगा... बस आप लाजवाब हो जाते हैं और इंतेहाई मुहब्बत से लबरेज़ एहसास के साथ चेहरे पे एक मुस्कान लिये हुए वहां से रुख़सत होते हैं....

     शहर ए लख़नऊ में हर साल पड़ने वाली शदीद सर्दियों के बेहद खुशगवार मौसम में इनकी दुकान पर गर्म तासीर के महकते हुए मसालों वाली गुलाबी क़श्मीरी चाय के दौर लगातार चलते ही रहते हैं आप दिन में यहां कई दफा इसके ज़ायक़े से लुत्फ़ अंदोज़ हो सकते हैं।

    पुराने लखनऊ की बढ़ती और घनी आबादी के चलते यहां के बहुत से बाशिंदे ल़ख़नऊ के गोमती पार खुले इलाकों में बस गए हैं.. लेकिन फिर भी इनके ये मुरीद बिना नांगा रोज़ लगभग आठ से दस किलोमीटर का लम्बा सफ़र तय करके इनके यहां पान खाने ज़रूर पहुंचते हैं.... मेरे बड़े अजीज़ ओ ख़ास दोस्त जनांब स्वप्निल साहब गोमती नगर से अक्सर इनके यहां आते हैं... और जाते व़क्त कुछ गिलौरियां बंधवा कर भी ले जाते हैं।

    बहुतों के उधार खाते भी इनकी दुकान पर चलते रहते हैं... जिसका तग़ादा शायद ही कभी हारून भाई किसी से करते हो... जिसने दे दिया तो रख लिया ना दिया तो फिर कोई बात नहीं।

    करोना काल की बंदी के दौरान मांस्क और सैनिटाइजर की गाइडलाइन के साथ इनकी सेवाएं लोगों के घरों तक पहुंचती रहीं... रोज़ ब रोज़ तयशुदा व़क्त पर हज़ारों बींड़े बिना नांगे के लोगों के घरों तक पहुंचते रहे... और वो भी बिना किसी शिकन के।

    मुंबई में बसने के बाद कभी क़दार ही मेरा ल़ख़नऊ आना होता है... तो फिर दिन में लगभग दो बार मैं इनकी दुकान की ज़ियारत करने जाता हूं ... और काफी देर तक वहीं पे रूका रहता हूं क्योंकि यहां पर तरह-तरह के दिलचस्प लोगों से मुलाक़ात जो होती रहती है.. और जो मेरे पिछले कई सालों के यहां के तजुर्बे रहे हैं... वो हमनें आपके सामने हूबहू रख दिये हैं...

    मेरा पान मांगने का उनसे एक अलग अंदाज़ है जिसे ये काफी पसंद करते हैं.. मैं उनसे कहता हूं
    जनांबे आली दो गिलौरियां इस नाचीज़ के लिए भी लगा लगा दें.... तो अर्ज़ किया है के.. स्टार, चांदी के वरक़ वाली इलायची, पिपरमिंट ,लक्ष्मीचूरा भीगी ,चिकनी निर्मली डली, म़ुख़्तल़िफ क़िमाम और ख़ुशबू से तर तमाम तरह की मीठी चटनियां और बाकी... जो आप बेहतर समझे... वो भी डाल दें ... बाकायदा तरन्नुम में ढली हुई मेरी इस  फरमाइश को हारुन भाई लगभग हंसते हुए पूरा करते हैं और साथ ही साथ वहां पर खड़े हुए उसके तमाम अहबाब मेरे इस अंदाज़ पर वाह वाही करते हैं जैसे के मैंने कोई उम्दा शेर कह दिया हो.... और अक्सर ऐसा भी हुआ है जब इन्होंने मुझसे पैसे ही नहीं लिए... मेरे लाख़ कहनें पर वो काउंटर पर एक मीठी थपकी मारकर कहते हैं अमां जाइये हुजूर बस रहने दीजिए आज का पान आपकी नज़र हमारी तरफ से...और... फिर दिल ओ ज़हन में नवाब वाजिद अली शाह का कहा हुआ इक मशहूर शेर उभरता है... 

     *ल़ख़नऊ हम पर फ़़िदा है,हम  फ़िदा ए ल़ख़नऊ*
    *क्या है ताक़त आसमां की जो हम से छुड़ाए ल़ख़नऊ*

    पुरानें ल़ख़नऊ के मेरे लगभग सभी दोस्तों को इनका पांन ज़्यादा अच्छा लगता है.. इसलिए अपनी शाम और दिन की बैठक जो कि हुसैनाबाद में मौजूद छोटे इमाम बाड़े के सामने नौबत ख़ाने में लगती है जहां पर मेरे अजीज़ दोस्त जनांब फ़िरदौस मिर्ज़ा, ज़फ़र क़ाज़मी, फरज़ान रिज़वी, नवाब ज़फर साहब, राजू भाई हक़ीम साजिद अब्बास और परवेज़ मिर्ज़ा इनके लिए भी मैं सबकी पसंद के हिसाब से कुछ पुड़ियां ले जाता हूं... पांन खानें के बाद ल़ख़नवी अंदाज़ में आपसी गुफ़्तग़ू का अपना अलग ही मज़ा है।

    तो साहिबांन ये थी एक बानगी ल़ख़नवी रिवायतों, रिवाज़ की,,,यहां के पुरकशिश लोगों की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा पांन और अदब के शहर की एक अज़ीम शख़्सियत....जनांब हारून साहब।

    मुंबई शहर की फिल्मी दुनियां से जुड़े हुए कई छोटे बड़े निर्माता-निर्देशक और फिल्मी सितारों के साथ ही साथ मेरे तमाम दोस्त अहबाब इनके जबरदस्त मुरीद हैं,, लखनऊ से मुंबई वापसी के दौरान उन सबके लिए पांन लाना मैं कभी भी नहीं भूलता हूं।
     
    उम्मीद करता हूं कि बड़ी ही मुहब्बत और मशक्कत के साथ लिखी हुई हमारी ये पोस्ट आपको पसंद आएगी... और मुझे ये भी पता है कि आप दोस्तों में से बहुत से लोग इन्हें ज़ाती तौर पर जानते भी होंगे... आपसे दिली तौर पर एक ग़ुज़ारिश है के इनके साथ ही साथ आप अपने इलाकों के कुछ पान फ़रोश जो के बड़े नांयाब और मशहूर हों तो उनका भी ज़िक्र आप अपने कमेंट के साथ करेंगे तो मुझे बेहद खुशी होगी।

    आपकी दुआओं का मुंतज़िर आपका दोस्त
    मुकेश चित्रवंशी 

    विशेष आभार अपने पिता सुप्रसिद्ध एवं वरिष्ठ सिनें अभिनेता एवं रंगकर्मी श्री विनय श्रीवास्तव साहब का और मेरे अज़ीज़ दोस्त जनांब फिरदौस मिर्ज़ा साहब जिनको मैंने इस पोस्ट को लिखनें के दौरान बहुत सताया है।

    पोस्ट के साथ शामिल बेहतरीन तस्वीरों के लिये मैं अपनें प्यारे दोस्त जनांब सैयद अली फ़रज़ान रिज़वी साहब का बहुत बहुत शुक्रग़ुज़ार हूं।
    लेखक 
    मुकेश चित्रवंशी 

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