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    सोमवार, 22 अप्रैल 2019

    सदर इमामबाड़ा जौनपुर का इतिहास

    सदर इमामबाड़ा जौनपुर का  इतिहास 

    दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह (1739 ई के आस पास )के शासन काल में राजा शेख हाशिम अली मछली शहर के पूर्वज शेख फतह  मुहम्मद उर्फ़ मंगली  मंगली मियाँ जौनपुर जो इलाहबाद में प्रबंधक सैनिक अधिकारी थे । उस समय जौनपुर इलाहाबाद के अधीन था । मंगली मियाँ बड़े ही धनवान और प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से थे । उसी समय इन्होने गोमती किनारे इसकी नीव डाली ।

    इमामबाड़े में भीतर इमाम हुसैन का ,हज़रत अब्बास का रौज़ा और क़दम ऐ रसूल है । इसकी तामीर फिर से बड़े पैमाने पे १८७८ इo  हुयी और इसके फाटक पे लखनऊ के मशहूर  शायर नफीस का शेर लिखा है । अब यह पथ्थर सदर इमाम बाड़े के मुख्य द्वार पे नहीं लगा है बल्कि मरम्मत के दौरान निकल गया और फिलहाल मेरे जाने पे यह मस्जिद के सामने इमामबाड़े के अंदर वाले चौक के ऊपर रखा हुआ है |

    इस इमामबाड़े में दरअसल कुछ मस्जिदें है कुछ रौज़े मासूमीन (ा.स) के और एक ईदगाह है | इस इमामबाड़े की आस पास की ज़मीन को क़ब्रिस्तान की तरह इस्तेमाल किया जाता है और जौनपुर के मरकज़ी इमामबाड़े की हैसियत से इसकी पहचान है जहां मुहर्रम की दसमी को पूरे शहर के ताज़िये दफन हुआ करते हैं |

     https://www.youtube.com/user/payameamn


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