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    शनिवार, 15 मार्च 2014

    वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका दहन |

    वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका दहन 16 मार्च शाम 6 बजकर 32 मिनट पर||

    होली का त्यौहर प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के  शुक्ल पक्ष पर पड़ने वाली  पूर्णिमा को  मनाया जाता है। फाल्गुन मास की सप्तमी तिथि से ही होली शुरु हो जाती है और उसकी धूम धूलैण्डी तक रहती है। होली की पहली रात को लकड़ियों तथा कंडों आदि का ढेर बनाकर होलिका दहन किया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 16 मार्च को सायंकाल 6 बजकर 32 मिनट पर पड़ रहा है। इसी वक्त प्रदोषकाल भी आरंभ होता है यानी दिन और रात एक होते हैं। 

    परंपरा के अनुसार सभी लोग अलाव के चारों ओर एकत्रित होते हैं। इसी अलाव को होली कहा जाता है। होली की अग्नि में सूखी पत्तियाँ, टहनियाँ, व सूखी लकड़ियाँ डाली जाती हैं, तथा लोग इसी अग्नि के चारों ओर नृत्य व संगीत का आनन्द लेते हैं। बसंतागमन के लोकप्रिय गीत भक्त प्रहलाद की रक्षा की स्मृति में गाये जाते हैं तथा उसकी क्रूर बुआ होलिका की भी याद दिलाते हैं। कई समुदायों में होली में जौ की बालियाँ भूनकर खाने की परंपरा है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि आगामी फ़सल कैसी होगी, इसका अनुमान होली की शिखाएँ किस ओर उड़ रही हैं तथा भुने हुए जौ के दानों के रंग व स्वाद से लगाया जा सकता है। मान्यता है कि होलिका दहन की शेष बची अग्नि और राख को अगले दिन ब्रह्म मूर्हत के समय घर में लाने से घर को अशुभ शक्तियों के दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है एवं शरीर पर इसका लेपन करने से सकारात्मकता का संचार होता है।


    होलिका दहन के पर्व से अनेक कहानियां जुड़ी हुई हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध कहानी प्रह्लाद की है। प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।


    समस्त जनपद वासियों को होली की शुभकामनाएं | संचालक - एस एम् मासूम 
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    Item Reviewed: वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका दहन | Rating: 5 Reviewed By: एस एम् मासूम
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