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    रविवार, 21 जनवरी 2018

    ऋतुओं की ऋतु वसंत -सुमित्रानंदन पंत

    बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाये | एस एम् मासूम 


    वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन पूरे भारत में देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनते हैं। जगह-जगह देवी सरस्वती की पूजा के लिए पंडाल लगाए जाते हैं। कहा जाता है कि इसी दिन, सृष्टि में प्राण फूंकने के उद्देश्य से ब्रह्मदेव ने मां सरस्वती की रचना की थी। इस पर्व को विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन वे अपनी किताबों की पूजा करते हैं और मां सरस्वती से विद्या का आशीर्वाद मांगते हैं। इस दिन पहनावा भी परंपरागत होता है. मसलन पुरुष लोग कुर्ता-पाजामा पहनते हैं, तो महिलाएं पीले रंग के कपड़े पहनती हैं.






    प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था। जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों मे सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।
     
    वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं। इसके बाद की घटना तो जगप्रसिद्ध ही है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।

    चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ।
    ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान ॥

    पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंदबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192 ई) यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।


    ऋतुओं की ऋतु वसंत -सुमित्रानंदन पंत
     


    फिर वसंत की आत्मा आई,
    मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण,
    अभिवादन करता भू का मन !
    दीप्त दिशाओं के वातायन,
    प्रीति सांस-सा मलय समीरण,
    चंचल नील, नवल भू यौवन,
    फिर वसंत की आत्मा आई,
    आम्र मौर में गूंथ स्वर्ण कण,
    किंशुक को कर ज्वाल वसन तन !
    देख चुका मन कितने पतझर,
    ग्रीष्म शरद, हिम पावस सुंदर,
    ऋतुओं की ऋतु यह कुसुमाकर,
    फिर वसंत की आत्मा आई,
    विरह मिलन के खुले प्रीति व्रण,
    स्वप्नों से शोभा प्ररोह मन !
    सब युग सब ऋतु थीं आयोजन,
    तुम आओगी वे थीं साधन,
    तुम्हें भूल कटते ही कब क्षण?
    फिर वसंत की आत्मा आई,
    देव, हुआ फिर नवल युगागम,
    स्वर्ग धरा का सफल समागम !



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    Item Reviewed: ऋतुओं की ऋतु वसंत -सुमित्रानंदन पंत Rating: 5 Reviewed By: M.MAsum Syed
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