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    बुधवार, 1 जून 2011

    आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला


    आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
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    सहमा ठगा सा खड़ा झांकता था
    आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
    कल पुर्जों ने गैस विषैली थी छोड़ी
    लाश सडती पड़ी कूड़े कचरों की ढेरी
    रक्त जैसे हों गंगा पशु पक्षी न कोई
    पेड़ हिलने लगे मस्त झोंके ने आँखें जो खोली
    व्योम नीला दिखा शिशु ने रो के बुलाया
    आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
    (फोटो गूगल /नेट से साभार )


    घबराहट अगर दिल बदल दो अब हैं दुनिया निराली
    पाप हर दिन में हो हर समय रात काली
    द्रौपदी चीखती -खून बहता -हर तरफ है शिकारी
    न्याय सस्ता ,खून बिकता, जेल जाते भिखारी
    घर से भागा युवा संग विधवा के फेरे रचाया
    आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
    धन हो इज्जत लूटे रखे अब जमीं ना सुरक्षित
    खून सर चढ़ के बोले उलटी गोली चले यही माथे पे अंकित
    घर जो अपना ही जलता दौड़ लाये क्या मुरख करे रोज संचित
    प्यार गरिमा को भूले छू पाए क्या -खुद को -रह जाये ना वंचित
    एक अपराधी भागा अस्त्र फेंके यहाँ आज माथा है टेका
    आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
    भूल माने जो- पथ शाम फिर लौट आये -न जाए
    डाल बाँहों का हार -प्यार देकर चलो साथ स्वागत जताए
    चीखती हर दिशा मौन क्यों हम खड़े ? आह सुनकर तो धाएं
    भूख से लड़खड़ा पथ भटक जा रहे बाँट टुकड़े चलो साहस बढ़ाएं
    स्वच्छ परिवेश रख -फूल मन को समझ
    ध्यान इतना कहीं ये न मुरझाये
    देख सूरज न कल का कहीं लौट जाए —-
    आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
    सहमा ठगा सा खड़ा झांकता था
    आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
    सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
    २.६.२०११
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    2 comments:

    1. वह आपने अच्छी कविता लिखी है!मेरे ब्लॉग पर् भी आये आने के लिए यहाँ क्लिक करे!-"SAMRAT BUNDELKHAND"

      जवाब देंहटाएं
    2. उपेन्द्र शुक्ल जी जी साधुवाद कविता को सराहने के लिए धन्यवाद हम अवश्य आप तक पहुंचेंगे -शुभ कामनाएं
      शुक्ल भ्रमर ५

      जवाब देंहटाएं

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    Item Reviewed: आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला Rating: 5 Reviewed By: SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR5
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